हरियाणा जैसे विकसित और औद्योगिक रूप से संपन्न राज्य में भी जातिगत भेदभाव की गहरी जड़ें आज तक कायम हैं। हाल ही में राज्य में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की आत्महत्या की घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दलित समुदाय वास्तव में सुरक्षित और सम्मानित है? हरियाणा में अनुसूचित जाति की आबादी लगभग 21 प्रतिशत है, फिर भी सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे में उनका प्रतिनिधित्व सीमित है। ऊंची जातियों, विशेष रूप से जाट समुदाय का प्रभाव इतना गहरा है कि दलितों को अब भी उनके अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है।
दलितों के सामाजिक उत्पीड़न की घटनाएं नई नहीं हैं। 2005 के गोहाना कांड और 2010 के मिर्चीपुर कांड में जाट समुदाय पर दलितों के घर जलाने और हिंसा करने के आरोप लगे थे। दोनों ही घटनाओं में निर्दोष दलित परिवारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा, मगर न्याय अब तक अधूरा है। यह विडंबना ही है कि ऐसे समय में भी जब हरियाणा औद्योगिक विकास और आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है, वहां जाति आधारित भेदभाव और असमानता समाज के भीतर जड़ जमाए हुए हैं।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर भी दलित समुदाय उपेक्षित रहा है। राज्य में अब तक कोई भी दलित मुख्यमंत्री नहीं बन सका। 1966 में हरियाणा राज्य के गठन के बाद से लेकर अब तक ज्यादातर मुख्यमंत्री जाट समाज से ही आए हैं। कुमारी शैलजा जैसी दलित नेता कांग्रेस में एक बड़ा चेहरा जरूर हैं, लेकिन जब भी उनके मुख्यमंत्री बनने की चर्चा होती है, ऊंची जातियों के नेता एकजुट होकर इसका विरोध कर देते हैं। इसके बावजूद दलितों की राजनीतिक भागीदारी और संघर्ष जारी है, लेकिन वास्तविक सशक्तिकरण अब भी दूर की बात लगती है।
हरियाणा पुलिस में हाल के घटनाक्रमों ने इस भेदभाव को और उजागर कर दिया है। एडीजी रैंक के आईपीएस अधिकारी वाई पूरन कुमार ने 7 अक्टूबर को जातिगत उत्पीड़न से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने अपने सुसाइड नोट में डीजीपी शत्रुजित कपूर सहित कई अधिकारियों पर भेदभाव के गंभीर आरोप लगाए थे। इस घटना के कुछ ही दिनों बाद एक अन्य एएसआई संदीप लाठर ने भी आत्महत्या कर ली। इन घटनाओं ने राज्य प्रशासन और समाज दोनों को झकझोर दिया है और यह साबित किया है कि ऊंची जातियों के प्रभाव के आगे दलित अधिकारी भी सुरक्षित नहीं हैं।
गुरु नानक और आर्य समाज जैसे सुधार आंदोलनों ने सदियों पहले जातिवाद मिटाने का प्रयास किया था, लेकिन हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में जाति आज भी एक कठोर सामाजिक सच्चाई है। सिख धर्म, जो समानता का प्रतीक माना जाता है, उसमें भी जातिगत ढांचे के निशान साफ दिखते हैं। रविदासिया, मजहबी सिख और दलित हिंदू अपने-अपने अलग समुदायों में बंटे हुए हैं। सवाल यह है कि जब समाज के सबसे प्रभावशाली और शिक्षित वर्ग भी जाति से ऊपर नहीं उठ पा रहे, तो फिर समानता की बात केवल भाषणों और नीतियों तक ही सीमित क्यों रह गई है? हरियाणा की ये घटनाएं साफ दिखाती हैं कि समृद्धि और शिक्षा के बावजूद सामाजिक चेतना अभी भी जाति के बोझ से मुक्त नहीं हो पाई है।
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