न्यूयॉर्क: यूएन मीटिंग में एस. जयशंकर का कड़ा संदेश, बोले—‘80 साल में भी नहीं बदला संयुक्त राष्ट्र’
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक संगठन पर सीधी और कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यूएन अपनी स्थापना के 80 साल बाद भी बदल नहीं पाया है, जबकि दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। जयशंकर ने चेतावनी दी कि अगर संयुक्त राष्ट्र अब भी सुधार नहीं करता, तो यह संगठन पूरी तरह अप्रासंगिक और बेअसर हो जाएगा। उन्होंने कहा कि आज संकट के समय दुनिया यूएन की ओर देखने के बजाय अपने-अपने रास्ते ढूंढ रही है, जो इसके कमजोर होते प्रभाव का संकेत है।
एस. जयशंकर न्यूयॉर्क में आयोजित United Nations Troop Contributing Countries (UNTCC) Army Chiefs’ Conclave को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा वैश्विक शांति और सहयोग में अग्रणी भूमिका निभाई है। अब तक भारत के तीन लाख से अधिक सैनिक संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भाग ले चुके हैं, जिससे भारत दुनिया का सबसे बड़ा सैनिक योगदान देने वाला देश बन गया है। उन्होंने कहा, “हमारे सैनिक दक्षिण सूडान, लेबनान, सीरिया और डीआर कांगो जैसे कठिन इलाकों में भी साहस, पेशेवर क्षमता और प्रतिबद्धता के साथ सेवा दे रहे हैं।”
जयशंकर ने कहा कि दुनिया आज महामारी, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अस्थिरता जैसी कई परस्पर जुड़ी चुनौतियों से जूझ रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे संकटों से निपटने के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग की भावना की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग का सबसे स्वाभाविक और प्रभावी मंच संयुक्त राष्ट्र ही होना चाहिए, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि यह संगठन समय के साथ खुद में सुधार लाए।
विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि संयुक्त राष्ट्र अब भी 1945 की परिस्थितियों को दर्शाता है, जबकि 2025 की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। उन्होंने कहा कि “जो संस्थाएं समय के साथ नहीं बदलतीं, वे अपनी प्रासंगिकता और वैधता दोनों खो देती हैं।” जयशंकर ने स्पष्ट कहा कि यूएन को अधिक समावेशी, लोकतांत्रिक और सहभागी बनाना जरूरी है ताकि यह विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ की आकांक्षाओं को बेहतर तरीके से प्रतिबिंबित कर सके।
अपने संबोधन के अंत में जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता इसी पर निर्भर करती है कि वह आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाता है या नहीं। उन्होंने दोहराया कि भारत जैसी उभरती शक्तियों की भागीदारी और आवाज़ को नज़रअंदाज़ करना अब यूएन के लिए नुकसानदायक साबित होगा।
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