चुनाव आयोग ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया कि संविधान ने उसे यह अधिकार और दायित्व सौंपा है कि वह मतदाता सूची में किसी भी व्यक्ति का नाम शामिल करने से पहले उसकी भारतीय नागरिकता की जांच करे। आयोग ने कहा कि यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी विदेशी नागरिक भारत में मतदान का अधिकार न पा सके। वोटर लिस्ट से जुड़े विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सर्वोच्च अदालत में सुनवाई जारी है, जो आगे भी जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नागरिकता का निर्धारण चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है, और इसके लिए नागरिकता की पड़ताल एक अहम हिस्सा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आधार कार्ड या अन्य पहचान दस्तावेज वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते। आयोग का कहना है कि आधार पहचान का प्रमाण है, लेकिन यह भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, इसलिए SIR प्रक्रिया के दौरान अन्य आवश्यक दस्तावेजों और तथ्यों की भी जांच जरूरी है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील दी गई थी कि अलग-अलग राज्यों में SIR के नाम पर मतदाताओं को परेशान किया जा रहा है और नागरिकता की जांच का काम चुनाव आयोग नहीं, बल्कि अन्य संवैधानिक संस्थाओं का है। इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि यदि नागरिकता की जांच नहीं की गई, तो मतदाता सूची में अवैध रूप से नाम शामिल होने का खतरा बना रहेगा, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती हो सकता है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में इस अहम मुद्दे पर बहस जारी है और गुरुवार को भी इस मामले की सुनवाई होनी है। इस फैसले पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर मतदाता सूची की प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था पर दूरगामी हो सकता है।
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