स्लीपर बस हादसों पर सख्त हुई सरकार, सभी राज्यों को जारी हुए नए सुरक्षा दिशा-निर्देश

देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार सामने आ रहे स्लीपर बस हादसों ने केंद्र सरकार को सख्त कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। खासकर जैसलमेर-जोधपुर और कुरनूल-बेंगलुरु रूट पर हुई हालिया भीषण आग की घटनाओं ने बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इन दुर्घटनाओं में दर्जनों यात्रियों की जान चली गई, जिसके बाद सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को विस्तृत एडवाइजरी जारी की है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि स्लीपर कोच बसों के रजिस्ट्रेशन और फिटनेस जांच के दौरान सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।

 

नई एडवाइजरी के तहत राज्यों को सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स (CMVR) 1989 के नियम 62 का सख्ती से अनुपालन करने का निर्देश दिया गया है। इसके साथ ही AIS:052 और AIS:119 मानकों को लागू करना अनिवार्य किया गया है। ये मानक बसों की बॉडी स्ट्रक्चर, इमरजेंसी एग्जिट, फायर डिटेक्शन सिस्टम और सुरक्षा उपकरणों से संबंधित हैं। मंत्रालय का कहना है कि यदि इन तकनीकी मानकों का पालन सही तरीके से किया जाए तो आग लगने जैसी घटनाओं में जानमाल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

 

जैसलमेर से जोधपुर रूट पर हुई दुर्घटना की जांच में कई गंभीर खामियां सामने आईं। संबंधित स्लीपर बस की लंबाई निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई। इमरजेंसी दरवाजों का आकार मानकों के अनुरूप नहीं था और सीटों की बनावट ऐसी थी कि आपात स्थिति में बाहर निकलने में बाधा उत्पन्न हो रही थी। निर्धारित दो रूफ हैच के स्थान पर केवल एक ही उपलब्ध था। इसके अलावा रूफ लगेज कैरियर तक पहुंचने के लिए अनुचित ढंग से सीढ़ी लगाई गई थी। ड्राइवर केबिन में पार्टीशन मौजूद था और फायर डिटेक्शन तथा सप्रेशन सिस्टम भी नियमों के अनुरूप स्थापित नहीं किया गया था।

 

कुरनूल-बेंगलुरु रूट की घटना में भी अनियमितताएं सामने आईं। संबंधित बस के रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र में केवल सीटिंग कैपेसिटी का उल्लेख था, जबकि स्लीपर लेआउट की स्पष्ट जानकारी दर्ज नहीं की गई थी। इससे संकेत मिलता है कि कुछ ऑपरेटर वाहन की वास्तविक संरचना छिपाकर पंजीकरण करा रहे हैं। 6 फरवरी 2026 तक देशभर में 49,616 स्लीपर कोच पंजीकृत हैं और 886 बस बॉडी बिल्डर्स को मान्यता दी जा चुकी है। ऐसे में निगरानी तंत्र की सख्ती बेहद आवश्यक मानी जा रही है।

 

सरकार का मानना है कि स्थानीय परिवहन अधिकारियों को वाहन प्रमाणन के समय ही इन तकनीकी विचलनों की पहचान कर लेनी चाहिए थी। अब राज्यों की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वे फिटनेस निरीक्षण को औपचारिकता न बनाकर वास्तविक तकनीकी परीक्षण के रूप में लें। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परिवहन विभाग इन निर्देशों को जमीनी स्तर पर कितनी गंभीरता से लागू करते हैं और क्या इससे स्लीपर बस हादसों में कमी आ पाती है।

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