चुनाव 2026: शेख हसीना के पतन के बाद पहली बार मतदान, भारत-पाकिस्तान की कड़ी नजर

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में गुरुवार को पहली बार संसदीय चुनाव कराए जा रहे हैं। अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में हो रहे इस चुनाव को देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाला माना जा रहा है। यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट होगा कि आने वाले वर्षों में बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति और विदेश नीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी। दक्षिण एशिया की राजनीति में इसकी अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों की निगाहें ढाका के राजनीतिक घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

यूनुस सरकार के कार्यकाल में भारत और बांग्लादेश के संबंधों में कुछ तनाव देखने को मिला है, जबकि पाकिस्तान के साथ नजदीकियां बढ़ने की चर्चाएं तेज हुई हैं। ऐसे में इस चुनाव का परिणाम यह संकेत देगा कि नई सरकार क्षेत्रीय कूटनीति में किस रुख को प्राथमिकता देगी। बांग्लादेश का इतिहास भी इस चुनाव को विशेष बनाता है। 1947 में भारत के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान के रूप में अस्तित्व में आया यह क्षेत्र 1971 में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र राष्ट्र बना। इसलिए भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का ऐतिहासिक संबंध आज भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करता है।

बांग्लादेश की संसदीय व्यवस्था भारत और पाकिस्तान से कई मायनों में अलग है। यहां की संसद, जिसे जातीय संसद कहा जाता है, कुल 350 सदस्यों वाली एकसदनीय व्यवस्था है। इनमें से 300 सीटों पर सीधे जनता मतदान करती है और सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार निर्वाचित होता है। शेष 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिनका चयन निर्वाचित सांसद दलों की ताकत के अनुपात में करते हैं। सरकार बनाने के लिए 300 प्रत्यक्ष सीटों में से 151 का बहुमत आवश्यक होता है, जबकि आरक्षित सीटों को बाद में भरा जाता है।

इसके विपरीत भारत और पाकिस्तान में संघीय ढांचा है, जहां राज्यों या प्रांतों की अपनी-अपनी विधानसभाएं और मुख्यमंत्री होते हैं। भारत में लोकसभा और राज्यसभा सहित द्विसदनीय संसद है, जबकि बांग्लादेश में केवल एक ही सदन है और कोई राज्य या मुख्यमंत्री की व्यवस्था नहीं है। पूरा प्रशासन केंद्र के अधीन संचालित होता है और देश को आठ डिवीजनों में विभाजित किया गया है, जिनके प्रमुखों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है। यही कारण है कि बांग्लादेश की शासन प्रणाली अधिक केंद्रीकृत मानी जाती है।

इस बार का चुनाव एक और वजह से चर्चा में है क्योंकि पूर्व सत्तारूढ़ आवामी लीग चुनाव मैदान में नहीं है, जबकि पहले प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दी गई है। बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में मतदाताओं का फैसला न केवल देश की सत्ता तय करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि बांग्लादेश आने वाले समय में क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में किस भूमिका में नजर आएगा।

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