इजराइल-अमेरिका के हमलों के बाद बदला ईरान का रुख, अब सऊदी से रक्षा साझेदारी की पहल… क्या फिर खौफनाक साजिश की तैयारी है?
मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा मोड़ देखने को मिला है, जहां वर्षों पुरानी दुश्मनी अब दोस्ती में बदलती दिखाई दे रही है। हाल ही में इजराइल और अमेरिका के संयुक्त हमलों का सामना कर चुका ईरान अब खाड़ी देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश में जुट गया है। खास बात यह है कि ईरान ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब से रक्षा क्षेत्र में संवाद बढ़ाने की शुरुआत की है। यह वही सऊदी अरब है, जिससे ईरान के संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, ईरान के सशस्त्र बलों के नए चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल अब्दुलरहीम मौसवी ने सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान से फोन पर अहम बातचीत की है। इस बातचीत में दोनों देशों ने क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने की दिशा में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा की। यह मौसवी की नियुक्ति के बाद सऊदी रक्षा मंत्री से उनकी पहली आधिकारिक बातचीत है।
बातचीत ऐसे समय पर हुई है जब कुछ हफ्ते पहले ही इजराइल के हमले में ईरान के पूर्व चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद हुसैन बाघेरी की मौत हुई थी। इसके बाद 13 जून को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने मौसवी को नया सैन्य प्रमुख नियुक्त किया था। ऐसे में उनकी यह पहल एक नई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जो क्षेत्रीय संतुलन को दोबारा परिभाषित कर सकती है।
ईरान और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से धार्मिक और राजनीतिक मतभेद रहे हैं। ईरान जहां खुद को शिया मुसलमानों का अगुवा मानता है, वहीं सऊदी अरब सुन्नी मुसलमानों का प्रतिनिधि देश रहा है। इन मतभेदों के चलते 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध और बिगड़ गए थे। सऊदी अरब को हमेशा यह डर रहा कि ईरान की क्रांति उसकी सत्ता और धार्मिक नेतृत्व को चुनौती दे सकती है।
इन गहरे मतभेदों का असर सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ईरान और सऊदी अरब ने विभिन्न देशों में प्रॉक्सी वॉर के ज़रिए भी एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। यमन, सीरिया, इराक और लेबनान जैसे देशों में दोनों ने विरोधी गुटों को समर्थन दिया है। यमन में जहां ईरान हूती विद्रोहियों के साथ खड़ा रहा, वहीं सऊदी अरब सरकार समर्थित गठबंधन का हिस्सा बना रहा।
हालांकि 2023 में चीन की मध्यस्थता के बाद दोनों देशों के बीच कुछ हद तक कूटनीतिक रिश्तों की बहाली हुई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर अविश्वास कायम रहा। अब जब ईरान एक बार फिर वैश्विक स्तर पर सैन्य दबाव में है, तो उसकी रणनीति में यह बदलाव देखने को मिल रहा है कि वह अपने पुराने विरोधियों से भी हाथ मिलाने को तैयार है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या यह दोस्ती स्थायी होगी या यह एक नई साजिश की भूमिका है? क्या ईरान वाकई रिश्ते सुधारना चाहता है या वह आगामी हमलों से पहले एक क्षेत्रीय गठजोड़ की तलाश में है? आने वाले हफ्तों में इस दोस्ती के इरादों की असली तस्वीर सामने आने की संभावना है।
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