पुणे के हिंजेवाड़ी इलाके से एक हैरान करने वाली घटना सामने आई है, जहां महिला आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और उनकी सहायिका ने 20 बच्चों को आंगनवाड़ी के कमरे में बंद कर दिया और ग्राम पंचायत की बैठक में चली गईं। यह घटना बुधवार, 26 नवंबर को दोपहर 11 से 12 बजे के बीच हुई। बच्चों की रोती-बिलखती आवाज का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हंगामा मच गया।
जानकारी के मुताबिक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सविता शिंदे और सहायिका शिल्पा साखरे को ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच द्वारा बुलाए गए मीटिंग में जाना था। लेकिन इस दौरान उन्होंने बच्चों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की और बच्चों को आंगनवाड़ी के कमरे में ताला लगाकर अकेला छोड़ दिया। बच्चों ने लगभग एक घंटे तक कमरे में बंद रहकर डर और अकेलेपन में जोर-जोर से रोने की आवाजें निकालें।
इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते ही अभिभावकों और नागरिकों में गुस्सा फैल गया। वीडियो में बच्चों की चीखें और भय स्पष्ट दिख रहे हैं। जब उनसे पूछताछ की गई, तो सविता शिंदे और शिल्पा साखरे ने कहा कि उन्होंने ताला इसलिए लगाया क्योंकि उन्हें मीटिंग में जाना था। इस जवाब ने लोगों में और ज्यादा नाराजगी बढ़ा दी।
मुलशी पंचायत समिति के बाल विकास परियोजना अधिकारी धनराज गिरम को घटना की जानकारी मिलते ही उन्होंने तुरंत कार्रवाई की। उन्होंने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को बैठक से बाहर बुलाकर बच्चों का ताला खोलने का आदेश दिया। कर्मचारियों ने अधिकारी के आदेश का पालन किया और बच्चों को मुक्त किया।
इस घटना ने आंगनवाड़ी कर्मचारियों की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छोटे बच्चों को इस तरह से बंद करना उनकी सुरक्षा के लिए अत्यंत खतरनाक था, क्योंकि किसी भी आपात स्थिति में उन्हें बचाने का कोई उपाय नहीं था। यह घटना सरकारी बाल विकास योजनाओं के नियमों का उल्लंघन भी है।
धनराज गिरम ने आश्वासन दिया कि सविता शिंदे और शिल्पा साखरे के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। वहीं, इस घटना ने आंगनवाड़ी कर्मचारियों की जिम्मेदारी और बच्चों की सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को स्पष्ट किया है। यह मामला समाज में बच्चों की सुरक्षा और सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही पर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है।
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