MLC Election 2026: BJP को लगा चुनावी डेंट: 11 सीटों के नतीजों में बीजेपी की रणनीति को झटका, कई सीटों पर बढ़ा हार का अंतर
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की शिक्षक एवं स्नातक कोटे की 11 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी की चुनावी तैयारियों और रणनीति के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी को अपनी पिछली जीती हुई लखनऊ खंड स्नातक सीट गंवानी पड़ी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को समाहित करने वाली शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी ने अपना कब्जा बरकरार रखा। चुनाव से पहले बीजेपी ने सभी सीटों पर जीत का लक्ष्य तय करते हुए संगठन और सरकार के स्तर पर तैयारियां तेज की थीं, लेकिन नतीजे पार्टी के दावों के अनुरूप नहीं रहे। खास बात यह रही कि कुछ सीटों पर हार का अंतर पिछले चुनाव के मुकाबले काफी बढ़ गया, जिससे पार्टी के चुनावी प्रदर्शन को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
वहीं साल 2020 में हुए विधान परिषद चुनाव में बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर आगरा स्नातक, लखनऊ शिक्षक एवं स्नातक, मेरठ शिक्षक एवं स्नातक और बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर जीत दर्ज की थी। इसके अलावा गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर पार्टी ने अपना उम्मीदवार उतारने के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी ध्रुव कुमार त्रिपाठी को समर्थन दिया था, जो चुनाव जीतने में सफल रहे थे। इस तरह बीजेपी और उसके समर्थित उम्मीदवार के खाते में कुल सात सीटें आई थीं। इसी प्रदर्शन को आधार बनाकर पार्टी ने इस बार भी सभी 11 सीटों पर जीत हासिल करने की रणनीति बनाई थी। हालांकि, चुनाव परिणामों में पार्टी को कई मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ा और पिछली बार जीती गई लखनऊ स्नातक सीट भी उसके हाथ से निकल गई।
महीनों पहले शुरू हुई तैयारी, फिर भी लक्ष्य से दूर रही पार्टी
विधान परिषद चुनाव को लेकर बीजेपी के रणनीतिकारों ने महीनों पहले से ही सभी सीटों पर जीत के दावे के साथ तैयारियां शुरू कर दी थीं। सरकार और संगठन के वरिष्ठ नेताओं के कार्यक्रम आयोजित किए गए और सीटवार चुनावी समीकरणों की समीक्षा की गई। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने भी अलग-अलग सीटों पर तैयारियों का जायजा लिया था। इसके बावजूद पार्टी सभी सीटों पर जीत के अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकी। पंकज चौधरी की अगुआई में यह पहला प्रत्यक्ष चुनाव था, ऐसे में नतीजों को संगठन की चुनावी तैयारियों और स्थानीय स्तर पर बने समीकरणों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
पश्चिमी यूपी में बीजेपी की पकड़ बरकरार, मेरठ और बरेली-मुरादाबाद में जीत
विधान परिषद चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन बीजेपी के लिए अपेक्षाकृत बेहतर रहा। मेरठ की शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटों पर पार्टी ने जीत दर्ज की, जबकि बरेली-मुरादाबाद शिक्षक सीट पर भी उसे जीत मिली। लखनऊ शिक्षक सीट पर भी बीजेपी उम्मीदवार ने आसानी से जीत हासिल की। हालांकि, जिन सीटों पर पार्टी को जीत मिली, उनमें से कुछ पर मुकाबला अपेक्षा से अधिक चुनौतीपूर्ण रहा। गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर जीत का अंतर बेहद कम रहा, जबकि दूसरी ओर कई सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों को पहले के मुकाबले ज्यादा बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ा। इससे साफ हुआ कि चुनावी तस्वीर सभी क्षेत्रों में एक जैसी नहीं रही और स्थानीय समीकरणों ने अहम भूमिका निभाई।
इलाहाबाद-झांसी से वाराणसी तक बढ़ा हार का अंतर
भारतीय जनता पार्टी के लिए चिंता की बात यह रही कि कुछ सीटों पर हार का अंतर पिछले चुनाव के मुकाबले काफी बढ़ गया।इलाहाबाद-झांसी सीट पर पिछली बार हार का अंतर 4,333 वोट था, जो इस बार बढ़कर 27 हजार से अधिक हो गया। इसी तरह वाराणसी शिक्षक सीट पर बीजेपी को पिछले चुनाव में 936 वोटों से हार मिली थी, जबकि इस बार हार का अंतर करीब पांच हजार वोट तक पहुंच गया। वाराणसी स्नातक सीट पर भी पार्टी का प्रदर्शन पिछली बार के मुकाबले कमजोर रहा। पिछली बार यहां भारतीय जनता पार्टी को 3,650 वोटों से हार मिली थी, लेकिन इस बार मतगणना के देर रात तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अंतर सात हजार से अधिक हो चुका था। इन नतीजों ने संबंधित सीटों पर पार्टी की चुनावी रणनीति और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
वाराणसी शिक्षक सीट पर प्रमोद कुमार मिश्र का दांव नहीं आया काम
वाराणसी शिक्षक सीट पर बीजेपी ने इस बार प्रमोद कुमार मिश्र को उम्मीदवार बनाया था। मिश्र पिछले चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे थे, लेकिन इस बार पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने के बावजूद जीत हासिल नहीं कर सके। दूसरी ओर, चंदेल गुट के प्रत्याशी चेतनारायण सिंह ने मुकाबले में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी। चुनावी समीकरणों और विभिन्न प्रत्याशियों के बीच वोटों के बंटवारे ने बीजेपी की उम्मीदों को प्रभावित किया। पार्टी ने इस सीट पर उम्मीदवार बदलकर जीत हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन नतीजों से स्पष्ट हुआ कि केवल उम्मीदवार बदलना ही चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सका।
लखनऊ स्नातक सीट पर सपा की कांति सिंह से हारे अवनीश सिंह
लखनऊ खंड स्नातक सीट पर बीजेपी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। पार्टी के उम्मीदवार अवनीश सिंह को समाजवादी पार्टी की कांति सिंह ने हरा दिया। मतगणना के देर रात तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अवनीश सिंह करीब 17,127 वोटों से पीछे रहे। दोनों उम्मीदवार कुर्मी बिरादरी से आते हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद बीजेपी इस बिरादरी पर विशेष ध्यान दे रही है और संगठन के शीर्ष स्तर पर हुए बदलावों को भी इसी व्यापक रणनीति के संदर्भ में देखा गया था। इसके बावजूद लखनऊ स्नातक सीट पर पार्टी को जीत नहीं मिल सकी। यह परिणाम इसलिए भी अहम है, क्योंकि बीजेपी ने पिछली बार इस सीट पर जीत दर्ज की थी और इस बार भी इसे बरकरार रखने के लिए चुनावी तैयारी की थी।
आगरा शिक्षक सीट पर टिकट चयन और स्थानीय नाराजगी चर्चा में
आगरा शिक्षक सीट पर भी बीजेपी की रणनीति को लेकर सवाल उठे। पिछली बार आकाश अग्रवाल ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतकर यह सीट हासिल की थी। इस बार वह बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे और इसके लिए प्रयास भी किए, लेकिन पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाने के बजाय हरिकिशोर तिवारी पर दांव लगाया, जो पिछले चुनाव में सपा समर्थित प्रत्याशी रहे थे। टिकट वितरण के इस फैसले के बीच आकाश अग्रवाल ने चुनाव में धांधली के आरोप लगाए और भावुक होकर अपनी नाराजगी जाहिर की। इस घटनाक्रम ने सीट पर चुनावी माहौल को और चर्चा में ला दिया। आगरा शिक्षक सीट का महत्व इसलिए भी अधिक था, क्योंकि इसके दायरे में बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह और उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय के गृह एवं निर्वाचन क्षेत्र भी आते हैं। ऐसे में इस सीट के नतीजों को बीजेपी के स्थानीय संगठन और उम्मीदवार चयन की रणनीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नतीजों ने संगठन की रणनीति और स्थानीय समीकरणों पर उठाए सवाल
शिक्षक एवं स्नातक कोटे की 11 सीटों के चुनाव परिणामों से बीजेपी के सामने एक मिली-जुली तस्वीर उभरी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अपनी पकड़ बनाए रखी, लेकिन लखनऊ स्नातक और वाराणसी की दोनों सीटों पर मिली हार ने उसके घोषित चुनावी लक्ष्य को प्रभावित किया। इलाहाबाद-झांसी और वाराणसी जैसी सीटों पर हार का बढ़ता अंतर भी महत्वपूर्ण रहा। इन परिणामों के आधार पर उम्मीदवार चयन, स्थानीय समीक्षा अहम होगी। हालांकि, इन चुनावों के नतीजों को पूरे प्रदेश के राजनीतिक रुझान का निर्णायक संकेत मानने के बजाय संबंधित सीटों के स्थानीय मुद्दों और मतदाता समूहों के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।
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