ट्रंप नहीं आएंगे तो मोदी भी नहीं जाएंगे, PM का US न जाना किस बात का संकेत?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सत्र में शामिल न होने का निर्णय लिया है। उनकी जगह विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। यह कदम न केवल मोदी-ट्रंप मुलाकात की संभावनाओं को समाप्त करता है बल्कि भारत की स्वतंत्र और दृढ़ विदेश नीति का भी संकेत देता है। दरअसल, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के UNGA सत्र में शामिल न होने की स्थिति में प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपनी यात्रा रद्द करने का फैसला किया।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र को औपचारिक रूप से सूचित कर दिया है कि इस वर्ष के सत्र में प्रधानमंत्री नहीं आएंगे और प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री करेंगे। UNGA की परंपरा के अनुसार, स्पीकर लिस्ट पहले प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के नाम से तैयार होती है। इस बार भारत ने बदलाव करते हुए जयशंकर का नाम जोड़ा है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि मोदी का दौरा निश्चित रूप से रद्द है। यह कदम अपने आप में राजनयिक संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी रणनीति के हिसाब से आगे बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी का अमेरिका न जाना द्विपक्षीय संबंधों पर सीधा असर नहीं डालेगा, लेकिन यह एक संदेश जरूर है। अब तक UNGA यात्रा के दौरान भारत-अमेरिका शीर्ष नेताओं की मुलाकातें होती रही हैं। इस बार ऐसा अवसर नहीं मिलने से संकेत जाता है कि भारत अमेरिका की शर्तों या उसके राजनीतिक एजेंडे पर निर्भर नहीं है। इसे अमेरिका के प्रति भारत के कड़े रुख और आत्मनिर्भर कूटनीति की झलक के रूप में देखा जा रहा है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि हाल ही में चीन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भारत की सक्रिय भागीदारी रही है। वहीं, क्वाड शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति की अनुपस्थिति और अब मोदी का UNGA में न जाना, दोनों घटनाएं मिलकर भारत की विदेश नीति में संतुलन और प्राथमिकताओं का स्पष्ट संदेश देती हैं। यह निर्णय अमेरिका और चीन दोनों को यह दिखाता है कि भारत अपनी रणनीति किसी भी बाहरी दबाव के बिना तय कर रहा है।
विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि अमेरिका के साथ भारत के संबंध मजबूत हैं और उनमें किसी तरह की कमजोरी नहीं आई है। लेकिन प्रधानमंत्री का यह निर्णय इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत ट्रंप प्रशासन के रवैये को लेकर अब नरमी बरतने के मूड में नहीं है। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर आत्मविश्वास की ओर संकेत करता है, जहां भारत अपने निर्णय खुद ले रहा है, न कि किसी अन्य देश के इशारे पर।
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