April 18, 2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मंदिर निधि से विवाह हॉल नहीं बन सकते

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए साफ किया कि श्रद्धालुओं द्वारा मंदिरों को दिए गए दान का उपयोग केवल धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों के लिए ही किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि इस धन का इस्तेमाल विवाह हॉल या किसी अन्य व्यावसायिक ढांचे के निर्माण में करना गलत है। यह फैसला मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखते हुए दिया गया, जिसमें तमिलनाडु सरकार की योजना को खारिज कर दिया गया था।

दरअसल, तमिलनाडु सरकार ने राज्य के 27 मंदिरों में विवाह हॉल बनाने का प्रस्ताव रखा था, जिसके लिए लगभग 80 करोड़ रुपये की निधि मंदिरों से खर्च की जानी थी। सरकार का तर्क था कि यह योजना समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को किफायती विवाह स्थल उपलब्ध कराने के लिए है। लेकिन अदालत में दाखिल याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि मंदिर निधियों का प्रयोग केवल पूजा, धार्मिक कार्यों और धर्मार्थ गतिविधियों के लिए होना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह प्रस्ताव हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त अधिनियम, 1959 का उल्लंघन करता है।

मद्रास हाई कोर्ट ने पहले ही अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि मंदिर निधि से विवाह हॉल जैसी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए पैसा खर्च नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। मंगलवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि श्रद्धालुओं द्वारा मंदिरों को दिए गए पैसे को सार्वजनिक या सरकारी धन नहीं माना जा सकता और इसे केवल धार्मिक या धर्मार्थ कार्यों में ही खर्च किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह भी कहा कि श्रद्धालु मंदिर में आस्था के चलते दान देते हैं, न कि विवाह मंडप जैसी सुविधाओं के निर्माण के लिए। बेंच ने सवाल किया कि अगर मंदिर परिसर में विवाह समारोह आयोजित हों और वहां अनुचित गाने या कार्यक्रम हों, तो क्या यह मंदिर की पवित्रता के अनुकूल होगा? अदालत ने इस संदर्भ में सुझाव दिया कि मंदिर निधि का उपयोग शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में होना चाहिए, जिससे समाज को सीधा लाभ मिले और धार्मिक उद्देश्यों की भी पूर्ति हो सके।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल इस योजना को लेकर कोई स्थगन आदेश जारी नहीं किया जा रहा है, लेकिन अदालत सरकार के निर्णय की वैधता पर विस्तृत सुनवाई करेगी। यह फैसला न केवल तमिलनाडु, बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है क्योंकि यह श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर निधि के उपयोग से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है।

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