36 सालों तक छुपाया अपना चेहरा, दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड तक ठुकराया – रहस्यमयी रही सुचित्रा सेन की जिंदगी
हिंदी और बंगाली सिनेमा में अपनी खास जगह बनाने वाली दिग्गज अभिनेत्री सुचित्रा सेन ने ग्लैमर और शोहरत से भरी फिल्मी दुनिया को अचानक अलविदा कह दिया था। उन्होंने 1955 में आई ‘देवदास’ में दिलीप कुमार के साथ पारो का किरदार निभाया और उसी से बॉलीवुड में एंट्री की थी।
सुचित्रा सेन, जिनका असली नाम रमा था, मां बनने के बाद फिल्मी दुनिया में आईं। उन्होंने करीब 25 वर्षों तक हिंदी और बंगाली फिल्मों में काम किया और फिर 1978 में आई फिल्म ‘प्रणय पाशा’ के फ्लॉप होने के बाद पर्दे के पीछे चली गईं।
उनकी जिंदगी के सबसे चर्चित किस्सों में एक यह भी है कि उन्होंने राज कपूर की फिल्म का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। जब राज कपूर उन्हें मनाने कोलकाता पहुंचे और घुटनों पर बैठकर फूलों का गुलदस्ता दिया, तो भी उन्होंने मना कर दिया।
2005 में उन्हें दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया जाना था, लेकिन उन्होंने उसे लेने से इनकार कर दिया। वजह थी — वह चाहती थीं कि उनके चाहने वाले उन्हें हमेशा उसी खूबसूरत छवि में याद रखें।
राइटर के मुताबिक, सुचित्रा सेन ने अपने आखिरी 36 सालों में किसी से कोई सार्वजनिक संपर्क नहीं रखा। यहां तक कि दिग्गज अभिनेता उत्तम कुमार के निधन से पहले जब उन्होंने मिलने की इच्छा जताई, तब भी सुचित्रा सेन ने मना कर दिया।
उनकी मृत्यु के समय भी किसी को उनका चेहरा नहीं देखने दिया गया। उनकी यह रहस्यमयी जिंदगी आज भी फिल्मी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है।
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