नीतीश कुमार की सियासी चाल, भागलपुर दंगे के मुद्दे पर विपक्ष को घेरते हुए मुस्लिम वोट बैंक को साधने की रणनीति
बिहार विधानसभा चुनाव में अब केवल आठ महीने का वक्त बचा है, लेकिन राज्य में सियासी बिसात पहले ही बिछाई जा चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को बिहार में विकास और सुशासन के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए हिंदुत्व की राजनीति को फिर से सेट किया। इस बीच, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भागलपुर दंगे का मुद्दा उठाकर न केवल विपक्ष को कठघरे में खड़ा किया, बल्कि बिहार के मुस्लिम समुदाय को भी सियासी संदेश दिया।
भागलपुर दंगों का सियासी संदर्भ
नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में एक अहम टॉपिक को उठाया, जो पिछले तीन दशकों से राज्य की राजनीति में गूंज रहा है – भागलपुर दंगे। 1989 में हुए इन सांप्रदायिक दंगों में करीब 1000 लोग मारे गए थे और इसके बाद बिहार की राजनीति में खासा बदलाव आया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीएम मोदी के सामने इस मुद्दे को छेड़ते हुए कहा कि उनकी सरकार के सत्ता में आने के बाद ही भागलपुर दंगे के पीड़ितों को न्याय मिला। नीतीश ने अपनी सरकार के कामों का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक वे सत्ता में नहीं आए, तब तक विपक्षी दलों ने मुस्लिमों का वोट तो लिया, लेकिन सांप्रदायिक दंगे को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।
नीतीश कुमार ने विपक्ष को घेरा
नीतीश कुमार ने अपनी रैली में खुलकर कहा कि उनके सत्ता में आने के बाद ही भागलपुर दंगे के मामले में आयोग गठित किया गया और पूरी जांच करवाई गई। उन्होंने कहा, “हमसे पहले की सरकारें मुस्लिमों का वोट तो लेती थीं, लेकिन हिंदू-मुस्लिम के झगड़े को बढ़ावा देती थीं। जब हमारी सरकार आई, तो हम ने दोषियों को सजा दिलाई और पीड़ितों के लिए राहत का काम किया।” नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि 15 साल तक सत्ता में रही आरजेडी सरकार ने इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की, क्योंकि आरोपियों में बड़े पैमाने पर यादव समुदाय के लोग शामिल थे।
मुस्लिम समुदाय के लिए सियासी संदेश
नीतीश कुमार की कोशिश इस बात को स्पष्ट करने की है कि बीजेपी के साथ रहते हुए भी वे मुस्लिम समुदाय के हक में काम करते रहे हैं। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि जब वे आरजेडी के साथ थे तब भी मुस्लिम समाज का समर्थन हासिल किया, और आज भी बीजेपी के साथ होते हुए वह उनकी सुरक्षा और कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि आरजेडी और कांग्रेस केवल मुस्लिमों का वोट लेते हैं, लेकिन उनके हक के लिए कुछ नहीं करते।
विपक्ष की मुश्किलें बढ़ी: क्या मुस्लिम वोट बिखरेंगे?
भागलपुर दंगे का जिक्र कर नीतीश कुमार ने आरजेडी और कांग्रेस को घेरा है, जो इस मुद्दे पर खामोश रहे थे। 1989 में कांग्रेस के शासनकाल में हुए इस दंगे के बाद से मुस्लिम समाज में नाराजगी थी, और बाद में जब लालू यादव ने सत्ता संभाली, तो भी इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। नीतीश कुमार ने सत्ता में आने के बाद इस मामले की पूरी जांच करवाई और दोषियों को सजा दिलाई, जिससे उन्होंने मुस्लिम वोटरों के बीच अपनी छवि को मजबूत किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का यह कदम बीजेपी के साथ अपनी गठबंधन की स्थिति को मजबूत करने के लिए भी है। बीजेपी के साथ रहते हुए वह मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी छवि को बेहतर बनाना चाहते हैं, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में वे उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर सकें।
मुस्लिम वोटों का सियासी गणित
बिहार में मुस्लिमों का वोट बैंक महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य में 17 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं जो 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। नीतीश कुमार ने यह समझ लिया है कि बीजेपी के साथ उनकी गठबंधन से मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा नाराज हो सकता है, और यही कारण है कि वह बार-बार भागलपुर दंगे के मुद्दे को उठा रहे हैं ताकि मुस्लिमों को यह विश्वास दिला सकें कि उनकी सरकार हमेशा उनके हक में काम करती रही है।
क्या नीतीश कुमार की यह रणनीति सफल होगी?
2020 के विधानसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन किया, तो मुस्लिम वोटरों ने उन्हें दूर किया था और जेडीयू को केवल 43 सीटें मिली थीं। इस बार नीतीश कुमार को मुस्लिम वोटों को फिर से अपने पक्ष में लाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि नीतीश कुमार की यह रणनीति, भागलपुर दंगे के मुद्दे को उठा कर मुस्लिम समुदाय का समर्थन प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकती है।
हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या नीतीश कुमार की यह रणनीति सियासी जमीन पर सफल हो पाएगी? बिहार के मुस्लिम वोटरों के लिए आरजेडी और कांग्रेस से दूरी बनाने का खतरा उन्हें कितना प्रभावित करेगा, और क्या उनकी कोशिशों से राजनीतिक समीकरण बदल पाएंगे? यह प्रश्न चुनाव के नजदीक आते ही स्पष्ट हो पाएगा।
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