दुनिया एक बार फिर परमाणु हथियारों की दौड़ के बेहद संवेदनशील दौर में प्रवेश कर चुकी है। 5 फरवरी 2026 को अमेरिका और रूस के बीच लागू आखिरी परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता न्यू स्टार्ट औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। इस संधि के खत्म होते ही दोनों देशों पर अपने परमाणु हथियारों की संख्या और तैनाती को लेकर लगी सभी कानूनी पाबंदियां हट गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वैश्विक सुरक्षा संतुलन कमजोर हो सकता है और परमाणु टकराव का जोखिम पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
न्यू स्टार्ट संधि पर अमेरिका और रूस ने वर्ष 2010 में हस्ताक्षर किए थे और यह 2011 से लागू हुई थी। इस समझौते का उद्देश्य शीत युद्ध के बाद बनी अविश्वास की स्थिति को कम करना और परमाणु हथियारों पर नियंत्रण बनाए रखना था। बीते 15 वर्षों तक इस संधि ने दोनों देशों के बीच परमाणु संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। इसके तहत मिसाइलों, लॉन्चरों और तैनात परमाणु वारहेड्स की संख्या तय सीमा में रखने के साथ-साथ एक-दूसरे के हथियारों की जांच की अनुमति भी दी गई थी।
संधि समाप्त होने के बाद सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि अब अमेरिका और रूस पर किसी भी तरह का कानूनी नियंत्रण नहीं रह गया है। न तो हथियारों की संख्या सीमित करने की बाध्यता है और न ही पारस्परिक निरीक्षण का कोई प्रावधान। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक बताया है। उनका कहना है कि करीब पांच दशक बाद दुनिया ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों पर कोई औपचारिक नियंत्रण नहीं बचा है।
दुनिया की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि अमेरिका और रूस मिलकर वैश्विक परमाणु हथियारों के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस की ओर से सामरिक परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को लेकर दिए गए बयानों ने पहले ही माहौल को तनावपूर्ण बना दिया था। ऐसे हालात में किसी भी तरह की गलतफहमी या सैन्य टकराव परमाणु संघर्ष में बदल सकता है, जिसका असर पूरी मानवता पर पड़ेगा।
भविष्य की राह भी जटिल नजर आ रही है। अमेरिका नई संधि में चीन को शामिल करने की बात कर रहा है, जबकि रूस ने जरूरत पड़ने पर सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक नेताओं ने दोनों देशों से जल्द नई परमाणु हथियार नियंत्रण संधि पर बातचीत शुरू करने की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो परमाणु अप्रसार की वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है और दुनिया एक बार फिर खतरनाक हथियारों की अंधी दौड़ में फंस सकती है।
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