भारत में मिर्गी के मरीजों की संख्या 1.2 करोड़: जन्मजात मिर्गी से जुड़ी रहस्यमयी बातें और उपचार के नए उपाय
भारत में मिर्गी (एपिलेप्सी) की बीमारी के मरीजों की संख्या 1.2 करोड़ के पार पहुँच चुकी है, यह खुलासा मेडिकल जर्नल लांसेट की हालिया रिपोर्ट से हुआ है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में इस बीमारी के मामलों में कमी आई है, लेकिन मिर्गी के नए केस अभी भी सामने आ रहे हैं, और यह चिंता का विषय बन चुका है। खासकर, मिर्गी के जन्मजात मामलों को लेकर कई रहस्य बने हुए हैं, जिनसे आज भी माता-पिता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ जूझ रहे हैं।
जन्मजात मिर्गी: शुरुआत में पहचान क्यों मुश्किल होती है?
कुछ मामलों में मिर्गी जन्म से ही बच्चों को हो जाती है, और इस स्थिति में बीमारी का पता शुरू में नहीं चलता। ऐसे बच्चों में शुरुआती कुछ सालों तक बीमारी के लक्षण नज़र नहीं आते, लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, मिर्गी के दौरे और लक्षण उभरने लगते हैं। माता-पिता अक्सर इसे किसी और बीमारी के लक्षण मान लेते हैं, जिससे इलाज में देरी हो सकती है।
कई ग्रामीण क्षेत्रों में तो मिर्गी को भूत-प्रेत से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह सिर्फ एक भ्रांति है। मिर्गी एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसका वास्तविक कारण ब्रेन की असामान्य गतिविधियाँ होती हैं।
मिर्गी क्यों होती है जन्मजात? डॉक्टरों का क्या कहना है?
मिर्गी के जन्मजात मामलों पर जीबी पंत अस्पताल के न्यूरोसर्जरी विभाग के एचओडी डॉ. दलजीत सिंह ने अपनी जानकारी साझा की है। वह बताते हैं, “मिर्गी ब्रेन की कोशिकाओं में असामान्य गतिविधियों की वजह से होती है। इसके कारण, मरीज को अचानक से बेहोशी, मांसपेशियों में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और दौरे पड़ने जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। जन्म के समय ब्रेन की चोट या ऑक्सीजन की कमी से मिर्गी हो सकती है। इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को संक्रमण जैसे टॉक्सोप्लाज्मोसिस या साइटोमेगालोवायरस होने से भी इस बीमारी का जोखिम रहता है।”
डॉ. दलजीत ने आगे बताया कि कुछ मामलों में ब्रेन की सेल्स की असामान्य व्यवस्था भी मिर्गी का कारण बन सकती है, जिससे इस बीमारी की शुरुआत होती है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि मिर्गी के लक्षण शुरुआत में अक्सर पहचाने नहीं जा सकते, और यह बाद में बच्चे की बढ़ती उम्र में ही सामने आते हैं।
क्या है मिर्गी से बचाव का उपाय?
डॉ. दलजीत के अनुसार, अगर मिर्गी जेनेटिक कारणों से होती है, तो इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन अगर यह गर्भावस्था के दौरान संक्रमण या अन्य कारणों से होती है, तो इससे बचाव संभव है। इसके लिए महिलाओं को गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में नियमित जांच करवानी चाहिए और अपनी सेहत का खास ध्यान रखना चाहिए। प्रेगनेंसी के दौरान उचित सावधानियों से मिर्गी जैसी बीमारी से बचाव किया जा सकता है।
बच्चों में मिर्गी का इलाज: नई संभावनाएँ
हालांकि, मिर्गी का पूरी तरह इलाज संभव नहीं है, लेकिन यह दवाओं और सर्जरी के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है। मिर्गी से पीड़ित बच्चों के लिए कीटोजेनिक डाइट का सुझाव दिया जाता है, जो एक हाई फैट, कम कार्बोहाइड्रेट डाइट होती है। यह डाइट मस्तिष्क की गतिविधियों को नियंत्रित करने में मदद करती है और मिर्गी के दौरे को कम करने में असरदार साबित होती है।
इसके अलावा, मिर्गी के इलाज में दवाओं का अहम योगदान है। इलाज के दौरान सही दवाओं का चयन और समय पर उपचार से मरीज के जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी भी की जाती है, जिससे मरीज को राहत मिल सकती है।
भारत में मिर्गी के मरीजों की बढ़ती संख्या: क्या है समाधान?
मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों के मुताबिक, मिर्गी के मामलों में कमी आ सकती है अगर समय पर सही जानकारी और उपचार दिया जाए। देश भर में मिर्गी के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। खासकर, ग्रामीण इलाकों में मिर्गी के बारे में भ्रांतियाँ दूर करने और सही उपचार की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।
समय पर इलाज और जानकारी के जरिए इस बीमारी से जूझ रहे मरीजों की मदद की जा सकती है। वहीं, गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित चेक-अप और स्वास्थ संबंधी सावधानियों से मिर्गी जैसी गंभीर बीमारी से बचाव किया जा सकता है।
अब यह देखना होगा कि भारत में मिर्गी के मरीजों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे, और इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों को किस तरह का समर्थन और सहायता मिलेगी।
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