Margashirsha Purnima 2025: मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर तुलसी चालीसा पाठ से प्रसन्न होंगी माता लक्ष्मी, मिलेगी धन-समृद्धि
मार्गशीर्ष पूर्णिमा हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ तिथि मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और चंद्र देव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान और दान-पुण्य करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और ऐसा करने से शुभ फल प्राप्त होता है। इसी दिन तुलसी माता की उपासना का भी विशेष महत्व बताया गया है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर तुलसी के पौधे की पूजा करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। मान्यता है कि इस दिन तुलसी चालीसा का पाठ करने से न केवल धन-धान्य की वृद्धि होती है बल्कि परिवार पर देवी लक्ष्मी की कृपा स्थायी रूप से बनी रहती है। इसी कारण भक्त इस दिन तुलसी पूजन और चालीसा पाठ जरूर करते हैं।
वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि 4 दिसंबर 2025 को सुबह 08:37 बजे से प्रारंभ होकर 5 दिसंबर 2025 को सुबह 04:43 बजे समाप्त होगी। इस बार मार्गशीर्ष पूर्णिमा का पर्व 4 दिसंबर को ही मनाया जाएगा और इसी दिन स्नान-दान तथा तुलसी पूजन श्रेष्ठ माना गया है।
तुलसी चालीसा (पूरा पाठ)
(जैसा आप भेज चुके हैं, पूरा पाठ बिना किसी बदलाव के नीचे दिया जा रहा है)
श्री तुलसी महारानी, करूं विनय सिरनाय।
जो मम हो संकट विकट, दीजै मात नशाय।।
नमो नमो तुलसी महारानी, महिमा अमित न जाय बखानी।
दियो विष्णु तुमको सनमाना, जग में छायो सुयश महाना।।
विष्णुप्रिया जय जयतिभवानि, तिहूँ लोक की हो सुखखानी।
भगवत पूजा कर जो कोई, बिना तुम्हारे सफल न होई।।
जिन घर तव नहिं होय निवासा, उस पर करहिं विष्णु नहिं बासा।
करे सदा जो तव नित सुमिरन, तेहिके काज होय सब पूरन।।
कातिक मास महात्म तुम्हारा, ताको जानत सब संसारा।
तव पूजन जो करैं कुंवारी, पावै सुन्दर वर सुकुमारी।।
कर जो पूजन नितप्रति नारी, सुख सम्पत्ति से होय सुखारी।
वृद्धा नारी करै जो पूजन, मिले भक्ति होवै पुलकित मन।।
श्रद्धा से पूजै जो कोई, भवनिधि से तर जावै सोई।
कथा भागवत यज्ञ करावै, तुम बिन नहीं सफलता पावै।।
छायो तब प्रताप जगभारी, ध्यावत तुमहिं सकल चितधारी।
तुम्हीं मात यंत्रन तंत्रन, सकल काज सिधि होवै क्षण में।।
औषधि रूप आप हो माता, सब जग में तव यश विख्याता,
देव रिषी मुनि औ तपधारी, करत सदा तव जय जयकारी।।
वेद पुरानन तव यश गाया, महिमा अगम पार नहिं पाया।
नमो नमो जै जै सुखकारनि, नमो नमो जै दुखनिवारनि।।
नमो नमो सुखसम्पति देनी, नमो नमो अघ काटन छेनी।
नमो नमो भक्तन दुःख हरनी, नमो नमो दुष्टन मद छेनी।।
नमो नमो भव पार उतारनि, नमो नमो परलोक सुधारनि।
नमो नमो निज भक्त उबारनि, नमो नमो जनकाज संवारनि।।
नमो नमो जय कुमति नशावनि, नमो नमो सुख उपजावनि।
जयति जयति जय तुलसीमाई, ध्याऊँ तुमको शीश नवाई।।
निजजन जानि मोहि अपनाओ, बिगड़े कारज आप बनाओ।
करूँ विनय मैं मात तुम्हारी, पूरण आशा करहु हमारी।।
शरण चरण कर जोरि मनाऊं, निशदिन तेरे ही गुण गाऊं।
क्रहु मात यह अब मोपर दाया, निर्मल होय सकल ममकाया।।
मंगू मात यह बर दीजै, सकल मनोरथ पूर्ण कीजै।
जनूं नहिं कुछ नेम अचारा, छमहु मात अपराध हमारा।।
बरह मास करै जो पूजा, ता सम जग में और न दूजा।
प्रथमहि गंगाजल मंगवावे, फिर सुन्दर स्नान करावे।।
चन्दन अक्षत पुष्प् चढ़ावे, धूप दीप नैवेद्य लगावे।
करे आचमन गंगा जल से, ध्यान करे हृदय निर्मल से।।
पाठ करे फिर चालीसा की, अस्तुति करे मात तुलसा की।
यह विधि पूजा करे हमेशा, ताके तन नहिं रहै क्लेशा।।
करै मास कार्तिक का साधन, सोवे नित पवित्र सिध हुई जाहीं।
है यह कथा महा सुखदाई, पढ़े सुने सो भव तर जाई।।
तुलसी मैया तुम कल्याणी, तुम्हरी महिमा सब जग जानी।
भाव ना तुझे माँ नित नित ध्यावे, गा गाकर मां तुझे रिझावे।।
यह श्रीतुलसी चालीसा पाठ करे जो कोय।
गोविन्द सो फल पावही जो मन इच्छा होय।।
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