सीकर: बाबा खाटू श्याम जी के ‘लखदातार’ नाम का रहस्य, जानें क्यों भक्त देते हैं यह उपाधि
सीकर (राजस्थान): देवउठनी एकादशी के अवसर पर देशभर से लाखों श्रद्धालु बाबा खाटू श्याम जी के दरबार में उमड़ते हैं। इसी दिन को बाबा श्याम का जन्मोत्सव भी माना जाता है। खाटू धाम में इस मौके पर भक्ति और आस्था का सैलाब उमड़ता है। भक्त जहां बाबा को ‘हारे का सहारा’ और ‘शीश के दानी’ कहकर पुकारते हैं, वहीं उनका एक और प्रसिद्ध नाम है — ‘लखदातार’, जिसका अर्थ है “लाखों का दान देने वाला।” लेकिन आखिर क्यों कहा जाता है बाबा को लखदातार? आइए जानते हैं इस नाम के पीछे की आध्यात्मिक कहानी।
बाबा खाटू श्याम जी को ‘लखदातार’ कहने के पीछे दो प्रमुख मान्यताएं हैं। पहली यह कि वे असीम दानी हैं — जो भी भक्त सच्चे मन से प्रार्थना करता है, बाबा उसे मांगी चीज़ से लाखों गुना अधिक प्रदान करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि श्याम बाबा कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते, इसलिए उन्हें “दाताओं के भी महादाता” कहा जाता है। दूसरी मान्यता के अनुसार, ‘लखदातार’ का अर्थ है जो भक्त के मन की बात ‘लख’ (जान) लेता है। यानी भक्त के कुछ कहने से पहले ही बाबा उसकी मनोकामना समझ जाते हैं और उसे पूरा कर देते हैं। यही करुणा और संवेदना उन्हें ‘लखदातार’ की उपाधि दिलाती है।
खाटू श्याम बाबा का यह स्वरूप महाभारत काल के वीर योद्धा बर्बरीक से जुड़ा है, जो भीम के पौत्र थे। कहा जाता है कि बर्बरीक के पास देवी दुर्गा का वरदान था — तीन बाण, जिनसे वे पूरी सेना को पलभर में नष्ट कर सकते थे। जब उन्होंने महाभारत युद्ध में शामिल होने का निश्चय किया, तो उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि वे हारने वाले पक्ष का साथ देंगे। धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा, और बर्बरीक ने बिना झिझक अपना शीश अर्पित कर दिया। उनके इस महान बलिदान से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने आशीर्वाद दिया कि कलियुग में वे ‘श्याम’ नाम से पूजे जाएंगे और हर भक्त की झोली भरेंगे।
इसी कारण खाटू श्याम बाबा आज भी अपने भक्तों के दुख हरने वाले, मनोकामना पूरी करने वाले और “लाखों का दान देने वाले” ‘लखदातार’ के रूप में पूजे जाते हैं। देवउठनी एकादशी पर उनका जन्मोत्सव न सिर्फ श्रद्धा का पर्व है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक भी है कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
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