झारखंड में बेटा और बहु ने बुजुर्ग मां को घर में बंद किया, महाकुंभ जाने के लिए छोड़ गए, पुलिस ने बचाया – क्या इसने मानवता को शर्मसार नहीं किया?
झारखंड के रामगढ़ जिले से मानवता को झकझोर देने वाला एक मामला सामने आया है, जिसमें एक बेटा अपनी बुजुर्ग मां को घर में बंद करके महाकुंभ में डुबकी लगाने के लिए प्रयागराज चला गया। यह घटना न केवल रिश्तों की दरार को उजागर करती है, बल्कि समाज की संवेदनहीनता पर भी सवाल खड़ा करती है।
महाकुंभ के लिए बेटा और बहु का जाना, मां का बंद होना
रामगढ़ जिला के अरगड़ा क्षेत्र के सिरका ए टाइप क्वार्टर में रहने वाले अखिलेश कुमार, जो CCL (कोल इंडिया) के कर्मचारी हैं, ने अपनी लगभग 65 वर्षीय मां संजू देवी को घर में बंद कर दिया और पत्नी-बच्चों के साथ तीन दिन पहले महाकुंभ के लिए प्रयागराज चले गए। इस दौरान उन्होंने मां के लिए केवल सूखा राशन छोड़ दिया, जो उनके वापस आने से पहले ही खत्म हो गया था।
संजू देवी घर में अकेले बंद होने के कारण बेहद परेशान हो गईं। भूख और कर्फ्यू में बंद रहने के कारण उन्होंने आवाज लगाकर मदद मांगने की कोशिश की। पड़ोसियों ने यह आवाजें सुनीं और तुरंत पुलिस को सूचित किया।
पुलिस का तुरंत कार्रवाई और मां का उद्धार
पुलिस की टीम घटनास्थल पर तत्काल पहुंची और ताला तोड़कर संजू देवी को घर से बाहर निकाला। एक तरफ मां अपने बेटे के बारे में चिंतित थी, वहीं दूसरी तरफ जब उनकी शादीशुदा बेटी को पता चला तो वह तुरंत वहां पहुंची। बेटी ने मां को खाना खिलाया और उन्हें अपने साथ ले गई। यह दृश्य हर किसी की आंखों में आंसू छोड़ गया, जब वह देख रही थी कि उसकी मां का इस प्रकार अपमान हुआ है, जिनके लिए उसने अपनी पूरी जिंदगी समर्पित की थी।
कहां है इंसानियत?
यह घटना न केवल बेटे के कर्तव्यों पर सवाल उठाती है, बल्कि समाज के उन मूल्यों को भी चुनौती देती है, जिन्हें हम परिवार और रिश्तों के बारे में मानते हैं। मां, जो नौ महीने तक अपने बेटे को अपने गर्भ में रखती है और फिर पूरी मेहनत और समर्पण के साथ उसे पालती है, आज उसी बेटे ने उसे घर में बंद कर दिया।
वहीं, समाज ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी और पुलिस से तुरंत इस मामले को सुलझाने की मांग की। पुलिस की तत्परता से संजू देवी को बचाया गया, लेकिन क्या इस घटना ने यह नहीं सवाल उठाया कि रिश्तों की गरिमा और मानवीय मूल्यों को किसने रौंदा है?
यह मामला समाज की संवेदनहीनता और परिवार के भीतर हो रहे अत्याचारों का उदाहरण बनकर सामने आया है, और अब यह समाज को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह हमारे रिश्तों की दिशा को बताता है? क्या आज भी हम अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को सही तरीके से निभा रहे हैं?
मानवता को शर्मसार करने वाली यह घटना – क्या हम सच्चे रिश्तों की अहमियत समझते हैं?
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