दिल्ली में आज लोकसभा में 150 वर्ष पुराने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ पर 10 घंटे की विशेष चर्चा होने जा रही है, जिसकी शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोपहर 12 बजे करेंगे। आजादी के आंदोलन में ऊर्जा और एकता का सबसे शक्तिशाली स्वर बने इस गीत को लेकर सड़क से संसद तक माहौल गर्म है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह गीत उस ब्रिटिश आदेश के विरोध में जन्मा था, जिसमें सार्वजनिक संस्थानों में ‘गॉड सेव द क्वीन’ का अनिवार्य गायन लागू किया गया था। इस फरमान ने बंकिम चंद्र चटर्जी को भीतर तक झकझोर दिया और उन्होंने विदेशी सत्ता के सामने सिर झुकाने के बजाय मातृभूमि की वंदना का निर्णय लिया।
कहा जाता है कि इसी आक्रोश और देशभक्ति की भावना से बंकिम चंद्र की कलम से लगभग 1875 में ‘वंदे मातरम्’ की रचना निकली, जिसने आने वाले दशकों में स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी। ‘आनंद मठ’ उपन्यास में शामिल यह गीत जल्द ही पूरे भारत में क्रांतिकारियों का प्रेरणा-स्रोत बन गया। जेल की दीवारें, फांसी का तख्ता या दमन की नीतियां—कुछ भी इस गीत की गूंज को रोक नहीं पाईं। 1896 में जब रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे सुर में प्रस्तुत किया, तो पूरा पंडाल गर्व और भावनाओं से भर उठा। बाद में श्री अरबिंदो ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया, जिसके बाद यह गीत दुनिया के कई विद्वानों तक पहुंच गया।
आजादी के बाद भी इस गीत का महत्व कम नहीं हुआ। 24 जनवरी 1950 को संविधान अपनाने के दिन ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया और ‘जन गण मन’ के समान सम्मान प्राप्त हुआ। इसकी रचना के संस्कृत और बंगाली मिश्रित स्वरूप ने इसे सौम्यता और शक्ति दोनों प्रदान कीं, जो आज भी भारतीयों के दिल में उसी गर्व और ऊर्जा के साथ जगती हैं। संसद में होने वाली आज की लंबी चर्चा सिर्फ एक गीत की कहानी नहीं है, बल्कि उस आवाज़ का सम्मान है जिसने गुलामी के अंधकार में करोड़ों भारतीयों को स्वतंत्रता की राह दिखाई।
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