लखनऊ CBI दफ़्तर पर धनुष-बाण से हमला: 25 साल पुराना केस बना सनकी हमलावर की हिंसा की वजह
लखनऊ के नवल किशोर रोड स्थित सीबीआई कार्यालय में शुक्रवार को उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब एक पूर्व रेलवे कर्मचारी ने अचानक धनुष-बाण निकालकर ड्यूटी पर तैनात एएसआई वीरेंद्र सिंह पर हमला कर दिया। यह घटना न केवल हैरान करने वाली थी, बल्कि सुरक्षा तंत्र पर भी कई सवाल खड़े कर गई।
हमले का तरीका और क्षणिक घटनाक्रम
शुक्रवार सुबह करीब 11:15 बजे, एएसआई वीरेंद्र सिंह हमेशा की तरह मुख्य गेट पर तैनात थे। तभी उन्होंने एक व्यक्ति को कार्यालय के पास संदिग्ध अवस्था में बैठे देखा और जब उससे पूछताछ की, तो वह बौखला गया। बिना चेतावनी के उसने धनुष निकाला और बाण चलाया, जो सीधा एएसआई के सीने में जाकर धंस गया। घाव लगभग 5 सेमी गहरा था, जिससे एएसआई को तुरंत सिविल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। सौभाग्य से बाकी तीरों से वे बच निकले।
हमलावर की पहचान और पृष्ठभूमि
पकड़े गए हमलावर का नाम दिनेश मुर्मु है, जो बिहार के मुंगेर जिले का निवासी है। वह कभी रेलवे में गैंगमैन के पद पर कार्यरत था। वर्ष 1995 में उसने रेलवे के ही एक कर्मचारी सीता राम गुप्ता को घूस लेते पकड़ा था, जिसका मामला सीबीआई के पास गया था। वर्ष 2000 में किसी विवाद या विभागीय कार्रवाई के चलते उसे नौकरी से निकाल दिया गया, और तभी से उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा।
धोखे और भ्रम में बीता जीवन
इंस्पेक्टर हजरतगंज के अनुसार, दिनेश को अब भी लगता है कि उसका पुराना केस सीबीआई कोर्ट में लंबित है। वह समय-समय पर सीबीआई कार्यालय आकर अधिकारियों से मिलना चाहता है और इसी क्रम में हिंसक हो जाता है। वर्ष 2005 में उसने दिल्ली स्थित सीबीआई दफ़्तर में भी पुलिसकर्मी पर हमला किया था, जिसके चलते उसे तिहाड़ जेल भेजा गया था। 2015 में जौनपुर रेलवे स्टेशन पर उसने एक जीआरपी जवान पर हमला कर दिया था और वहाँ भी वह साढ़े तीन साल तक जेल में रहा।
मानसिक स्थिति और वर्तमान कार्रवाई
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि दिनेश मानसिक रूप से अस्वस्थ है और उस पर पहले भी हमले के केस दर्ज हैं। घटना के बाद उसे हिरासत में लेकर मेडिकल जांच कराई जा रही है। वहीं, एएसआई वीरेंद्र सिंह की हालत अब स्थिर बताई जा रही है और अस्पताल में इलाज जारी है।
सवाल खड़े करता है हमला
इस घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कैसे एक हथियारबंद व्यक्ति इतनी आसानी से सीबीआई जैसे हाई-सिक्योरिटी दफ़्तर तक पहुंच गया। साथ ही यह भी सोचने का विषय है कि पुराने केसों के नाम पर भ्रमित मानसिक रोगी अब कानून व्यवस्था के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।
यह वारदात न केवल सनसनीखेज थी, बल्कि यह भी साबित करती है कि मानसिक विक्षिप्तता और अधूरे न्याय की प्रक्रिया किस कदर हिंसा का रूप ले सकती है।
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