बिहार चुनाव के बाद लाल हुआ बाजार – आखिर एग्जिट पोल की खुशी नतीजों पर क्यों मात खा गई?

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बार फिर शेयर बाजार की अनोखी चाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जो बाजार एग्जिट पोल के बाद खुशी से झूम उठा था, वही नतीजों के पक्के होते ही लाल निशान में फिसल गया। बुधवार को सेंसेक्स 750 अंक चढ़ा था, लेकिन शुक्रवार को NDA की प्रचंड जीत कन्फर्म होते ही 376 अंक गिरकर नीचे आ गया। यह विरोधाभास बाजार की उस मानसिकता की तरफ इशारा करता है, जिसे समझना आम निवेशक के लिए बेहद जरूरी है।

शेयर बाजार की चाल हमेशा सरकारों की स्थिरता और नीतिगत स्पष्टता पर निर्भर करती है। एग्जिट पोल में जैसे ही NDA की मजबूत जीत दिखाई दी, बाजार ने इसे विकास और स्थिरता के संकेत के रूप में लिया और तेजी से उछाल मार दिया। लेकिन नतीजों के दिन अक्सर बाजार का रुझान उल्टा होता है—और इस बार भी वही हुआ। नतीजे NDA के पक्ष में वैसे ही आए, जैसे एग्जिट पोल ने कहा था, लेकिन बाजार ने जश्न मनाने के बजाय मुनाफा वसूली शुरू कर दी।

शेयर बाजार का यह व्यवहार नया नहीं है। 2010, 2015 और 2020—इन तीनों बिहार चुनावों में भी नतीजों के दिन बाजार में गिरावट आई थी। वजह वही—एग्जिट पोल की उम्मीदों पर खरीदारी और नतीजों के समय भारी बिकवाली। निवेशक उम्मीद पर खरीदते हैं, और खबर पक्की होने पर बेचकर मुनाफा जेब में डाल लेते हैं। यही “प्रॉफिट बुकिंग” बाजार को लाल कर देती है।

बाजार का असली खेल यह है कि बड़े निवेशक एग्जिट पोल जैसी “पॉजिटिव न्यूज़” पर पहले ही खरीदारी कर लेते हैं। कीमतें ऊपर जाते ही वे कुछ दिनों बाद उसी स्टॉक को बेचने का इंतजार करते हैं। नतीजे आने पर जब जनता खरीदने की सोच रही होती है, तब बड़े निवेशक बिकवाली कर रहे होते हैं—यही फर्क बाजार की दिशा बदल देता है।

इस बार बाजार की गिरावट का दूसरा बड़ा कारण वैश्विक बाजारों का खराब माहौल भी रहा। अमेरिका के डाउ, नैस्डैक और S&P 500 एक दिन पहले भारी गिरावट के साथ बंद हुए थे। टेक कंपनियों में खासी मंदी आई। फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई, जिसने निवेशकों को सतर्क कर दिया। एशियाई बाजार भी लाल निशान में कारोबार कर रहे थे, जिसका दबाव भारतीय बाजार पर साफ दिखा।

इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतें एक झटके में बढ़कर 60 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गईं। भारत के लिए यह बहुत बड़ा झटका होता है क्योंकि इससे आयात महंगा होता है और महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है। निवेशकों ने इसे आर्थिक जोखिम माना और सुरक्षित मौके तलाशने लगे।

विदेशी निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली ने भी बाजार को कमजोर कर दिया। पिछले चार दिनों से वे बड़ी मात्रा में भारतीय शेयर बेच रहे हैं। गुरुवार को ही 383 करोड़ रुपये की बिकवाली हुई, जिसने बाजार के सेंटिमेंट को नीचे खींच दिया।

इसी बीच, बाजार की अस्थिरता मापने वाला इंडिया VIX भी 12% के आसपास पहुंच गया—जो इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में भी उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। निवेशक जोखिम लेने की बजाय सावधान रुख अपनाए हुए हैं।

सार यही है—बिहार चुनाव ने बाजार को ऊपर नहीं, नीचे इसलिए धकेला क्योंकि बाजार उम्मीदों पर चलता है, नतीजों पर नहीं। और उम्मीदें जितनी मजबूत होती हैं, नतीजे आते ही उतनी ही तेजी से मुनाफावसूली शुरू हो जाती है।

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