आजमगढ़ में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां मदरसा शिक्षक शमशुल हुदा खान पिछले 18 साल से ब्रिटेन में रह रहा था, लेकिन इसके बावजूद उसे यूपी सरकार से वेतन, सेवा संबंधी लाभ और यहां तक कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन भी जारी होती रही। एटीएस की जांच रिपोर्ट के बाद इस पूरे प्रकरण में साल 2007 से 2017 तक तैनात तीन जिला अल्पसंख्यक अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। वर्तमान में ये अधिकारी बरेली, अमेठी और गाजियाबाद में तैनात हैं।
शमशुल हुदा का चयन 12 जुलाई 1984 को आजमगढ़ के मुबारकपुर स्थित मदरसा दारूल उलूम अहले सुन्नत मदरसा अशरफिया में सहायक अध्यापक (आलिया) के पद पर किया गया था। लेकिन एटीएस की जांच में पता चला कि वह वर्ष 2007 में ब्रिटेन चला गया और 2013 में वहां की नागरिकता भी ले ली। इसके बावजूद न तो उसकी हाजिरी की जांच हुई और न ही दस्तावेजों की पुष्टि—और उसे लगातार वेतन, वार्षिक वेतन वृद्धि और अन्य भत्ते मिलते रहे। हैरानी की बात यह है कि 2018 में उसे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति देकर पेंशन भी मंजूर कर दी गई।
एटीएस की रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि शमशुल हुदा इस्लामी धर्म प्रचार के नाम पर पाकिस्तान आता-जाता था और कई संदिग्ध व्यक्तियों के संपर्क में था। उसके भारत में भी जम्मू-कश्मीर के संदिग्धों से करीबी संबंध होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के आधार पर उसके खिलाफ खलीलाबाद कोतवाली में एफआईआर दर्ज कराई गई है। साथ ही जिस मदरसे में उसकी नियुक्ति दिखायी गई थी, उसे तत्काल प्रभाव से सील कर दिया गया है। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी गंभीर चिंता का विषय बन गया है।
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