May 1, 2026

भारत और अमेरिका से पंगा लेना चीन को पड़ा महंगा, PhD होल्डर्स बन रहे डिलीवरी बॉय

चीन, जिसे दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, आज खुद बेरोजगारी की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। बीजिंग निवासी डिंग युआनझाओ की कहानी इस संकट की प्रतीक बन गई है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से मास्टर्स करने वाले और बायोलॉजी में पीएचडी होल्डर डिंग आज बीजिंग की सड़कों पर फूड डिलीवरी कर रहे हैं।

डिंग ने चीन की प्रतिष्ठित सिंगहुआ यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में स्नातक, पेकिंग यूनिवर्सिटी से मास्टर्स, सिंगापुर की नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से पीएचडी और फिर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बायोडायवर्सिटी में डिग्री हासिल की। बावजूद इसके, उन्हें स्थायी नौकरी नहीं मिली। यह स्थिति सिर्फ डिंग की नहीं है, बल्कि लाखों उच्च शिक्षित चीनी युवाओं की है, जिन्हें मजबूरी में अस्थायी और कम वेतन वाली नौकरियों में जाना पड़ रहा है।

चीन की यह हालत यूं ही नहीं हुई। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ लगातार बढ़ते व्यापारिक और तकनीकी विवाद, भारत के साथ सीमा पर तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव ने उसकी अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया है। विदेशी निवेश में गिरावट और एक्सपोर्ट में कमजोरी ने युवाओं के लिए अवसर और भी सीमित कर दिए हैं।

चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, मई 2025 में 16 से 24 वर्ष की आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 14.9% रही, जो एक गंभीर संकेत है कि शिक्षा और नौकरी के अवसरों के बीच बड़ा फासला बन चुका है। डिंग युआनझाओ का मामला चीन की आर्थिक व्यवस्था की उन कमजोरियों को उजागर करता है, जो अब धीरे-धीरे गहराते संकट का रूप लेती जा रही हैं।

यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत और अमेरिका जैसे देशों से टकराव और आक्रामक वैश्विक नीति अब चीन को भारी पड़ रही है — न केवल रणनीतिक रूप से, बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी।

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