दुनिया की जेलों में लटकी 54 भारतीयों पर फांसी की तलवार, यमन में निमिषा प्रिया की फांसी अब बस दो दिन दूर
38 वर्षीय भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की किस्मत अब यमन की जेल की कोठरी में उलझी है। उनकी जिंदगी अब गिने-चुने घंटों में बंध चुकी है। अगले दो दिनों में उन्हें फांसी दी जा सकती है। लेकिन यह केवल निमिषा की कहानी नहीं है। विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल दुनियाभर की जेलों में कुल 54 भारतीय नागरिक मौत की सजा का इंतजार कर रहे हैं। यह एक भयावह आंकड़ा है, जो देश की सीमाओं के पार फैली एक खामोश त्रासदी की ओर इशारा करता है।
निमिषा प्रिया मूल रूप से केरल के पलक्कड़ जिले की रहने वाली हैं। उन्हें 2017 में अपने यमनी बिजनेस पार्टनर की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। यमन की अदालत ने 2020 में उन्हें मौत की सजा सुनाई, जिसे 2023 में अंतिम अपील खारिज होने के बाद अब किसी भी वक्त लागू किया जा सकता है। फिलहाल 16 जुलाई को उन्हें फांसी देने की तारीख तय की गई है। इसी को रोकने के लिए प्रयासों का दौर तेज़ हो गया है।
परिवार ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए ब्लड मनी के तौर पर 10 लाख डॉलर देने की अनुमति मांगी है, ताकि यमन में प्रचलित कानूनों के अनुसार पीड़ित परिवार को मुआवज़ा देकर सजा को टाला जा सके। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर व्यक्तिगत हस्तक्षेप की अपील की है। वहीं विदेश मंत्रालय ने बताया है कि सरकार इस मामले में हरसंभव कदम उठा रही है।
विदेश मंत्रालय की ओर से यह भी खुलासा हुआ है कि वर्तमान में 54 भारतीय नागरिक अलग-अलग देशों में मौत की सजा का सामना कर रहे हैं। इनमें से सबसे ज़्यादा 29 भारतीय UAE की जेलों में हैं। इसके अलावा 12 सऊदी अरब में, 3 कुवैत में और 1 कतर में बंद है। यह आंकड़े न केवल विदेशों में फंसे भारतीयों की स्थिति को उजागर करते हैं, बल्कि विदेशों में काम करने वाले नागरिकों के लिए एक गंभीर चेतावनी भी हैं।
अब सवाल यह है कि क्या निमिषा को जीवनदान मिल सकेगा? क्या ब्लड मनी की पेशकश, सरकार का दखल और न्यायिक पहल उन्हें बचा पाएंगे? जवाब आने वाले कुछ घंटों में सामने होगा। लेकिन फिलहाल, उनकी फांसी और दुनियाभर में सज़ा-ए-मौत की राह देख रहे अन्य भारतीयों की हालत ने एक बार फिर हमें इस सच्चाई से रूबरू कराया है कि जब कोई भारतीय विदेश में कानून की गिरफ्त में आता है, तो उसकी आज़ादी और ज़िंदगी दोनों दांव पर लग जाती हैं।
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