May 5, 2026

24 घंटे का दिन अब बीते ज़माने की बात! धरती की रफ्तार बढ़ी, वक्त हो रहा है छोटा – वैज्ञानिक भी हैरान

कहते हैं सर्दियों में दिन छोटे और गर्मियों में लंबे होते हैं, लेकिन अब वक्त खुद बदलने लगा है। मौसम नहीं, पृथ्वी की गति इस कदर बदल रही है कि दिन अब असल मायनों में छोटे हो रहे हैं—और यह बदलाव न तो आम लोगों की नजर में आता है, न ही मौसम से जुड़ा है।

यह है पृथ्वी की आंतरिक गतिविधियों और खगोलीय ताकतों का असर, जो अब वैज्ञानिकों के लिए भी रहस्य बन गया है। धरती की रोटेशन स्पीड यानी घूमने की गति अचानक तेज हो गई है, और इसका सीधा असर हमारे रोजमर्रा के समय पर पड़ रहा है। हर गुजरता दिन अब कुछ मिलीसेकंड छोटा होता जा रहा है। यानी 24 घंटे का दिन, जो अब तक हमारी दिनचर्या का आधार था, धीरे-धीरे सिकुड़ता जा रहा है। समय जैसे हाथ से फिसल रहा हो… और विज्ञान अब यह सोचने पर मजबूर है कि क्या पृथ्वी की धुरी में कोई असामान्य बदलाव हो रहा है, या फिर समय का चक्र खुद एक नए रूप में ढलने लगा है?

लाइव साइंस और टाइम एंड डेट जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसेमंद संस्थाओं की हालिया रिपोर्टों ने इस रहस्य को और भी गहरा कर दिया है। रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि जुलाई और अगस्त के महीनों में कई दिन ऐसे होंगे, जब धरती 24 घंटे से पहले ही अपना एक चक्कर पूरा कर लेगी। वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से 9 जुलाई, 22 जुलाई और 5 अगस्त को चिन्हित किया है, जब पृथ्वी की घूमने की गति अपने चरम पर होगी। इन दिनों, हर दिन औसतन 1.3 से 1.51 मिलीसेकंड तक छोटा होगा। यूएस नेवल ऑब्जरवेटरी और इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन एंड रेफरेंस सिस्टम्स सर्विस (IERS) के हालिया आंकड़े भी इस ओर इशारा करते हैं कि धरती ने पिछले बुधवार को 24 घंटे से लगभग 1.34 मिलीसेकंड कम समय में अपनी धुरी पर एक पूरा चक्कर पूरा कर लिया। यानी अब दिन सच में छोटे हो रहे हैं—और यह सब कुछ हो रहा है हमारी आंखों के सामने, बिल्कुल खामोशी से, बिना शोर के।

यह कोई एक दिन की घटना नहीं है, न ही यह कोई तात्कालिक विसंगति है। धरती की गति में यह बदलाव पिछले कुछ वर्षों से लगातार दर्ज किया जा रहा है। 2020 से लेकर अब तक, दर्जनों ऐसे दिन सामने आए हैं, जब पृथ्वी ने 24 घंटे से पहले अपनी परिक्रमा पूरी कर ली। इस पैटर्न की चरम अवस्था 5 जुलाई 2024 को देखने को मिली, जब अब तक का सबसे छोटा दिन रिकॉर्ड किया गया—जो सामान्य से 1.66 मिलीसेकंड छोटा था।

यह पूरी प्रक्रिया विज्ञान के लिए एक गहरी पहेली है। पृथ्वी की गति कभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं रही है, लेकिन इतनी तेजी से उसका घूमना असामान्य माना जा रहा है। यह गति कई प्राकृतिक और कृत्रिम कारकों से प्रभावित होती है—जैसे सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्व बल, पृथ्वी के आंतरिक कोर की गतिविधियां, महासागरों में बहाव, ध्रुवों पर बर्फ का पिघलना, और यहां तक कि इंसानों द्वारा भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन। जब पृथ्वी का द्रव्यमान ऊपर-नीचे होता है, तो यह एक घूमते हुए लट्टू की तरह तेज़ हो सकती है। इसी तरह, चंद्रमा की स्थिति जब पृथ्वी के इक्वेटर के करीब आती है, तो इसका गुरुत्व बल धरती को और तेज घूमने के लिए प्रेरित करता है। यह बेहद जटिल प्रणाली है, लेकिन इसका नतीजा साफ है—दिन अब पहले से छोटे हो रहे हैं।

इतिहास गवाह है कि पृथ्वी का रोटेशन समय के साथ बदला है। लगभग 1 से 2 अरब साल पहले, जब चंद्रमा धरती के बेहद करीब था, तब एक दिन केवल 19 घंटे का हुआ करता था। जैसे-जैसे चंद्रमा दूर गया, पृथ्वी की गति धीमी होती गई और दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगे। डायनासोरों के युग में, करीब 7 करोड़ साल पहले, एक दिन 23.5 घंटे का था। यह परिवर्तन प्राकृतिक था, और लाखों वर्षों में धीरे-धीरे हुआ। लेकिन आज, जो हो रहा है, वह उस प्राकृतिक प्रवृत्ति के उलट है। अब दिन छोटे हो रहे हैं और वह भी काफी तेजी से।

अब अगर यह सवाल उठ रहा है कि इसका आम जीवन पर क्या असर पड़ेगा, तो जवाब थोड़ा पेचीदा है। हो सकता है कि आम आदमी को अभी इसका फर्क न महसूस हो, क्योंकि मिलीसेकंड का अंतर किसी की दिनचर्या को नहीं बदलता। लेकिन तकनीकी रूप से यह बहुत महत्वपूर्ण है। इंटरनेशनल टाइम सिस्टम, जिसे परमाणु घड़ियों से संचालित किया जाता है, उसे ऐसे बदलावों के अनुरूप खुद को ढालना पड़ता है। लीप सेकंड जोड़ने या घटाने की प्रक्रिया अब और जटिल हो सकती है। अगर धरती की गति इसी तरह अस्थिर बनी रही, तो समय की गणना प्रणाली को पूरी तरह फिर से परिभाषित करना पड़ सकता है।

टेक्सास यूनिवर्सिटी के स्पेस रिसर्च सेंटर में कार्यरत प्रोफेसर क्लार्क आर. विल्सन का कहना है कि यह बदलाव शायद स्थायी न हो। दीर्घकाल में, चंद्रमा अब भी हर साल 3.8 सेंटीमीटर दूर जा रहा है और इससे एक बार फिर पृथ्वी की गति धीमी हो सकती है, दिन फिर से लंबे हो सकते हैं। लेकिन यह प्रक्रिया इतनी धीमी है कि इसका असर कई लाख वर्षों में दिखेगा, मानव जीवन में नहीं।

इस वक्त जो हो रहा है, वह विज्ञान, खगोलशास्त्र और समय की अवधारणा—तीनों के लिए एक चेतावनी जैसा है। समय, जिसे अब तक सबसे स्थायी और निश्चित माना जाता था, अब अपनी स्थिरता खोता नजर आ रहा है। यह केवल वैज्ञानिकों के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए भी सोचने का विषय है। क्या हम उस भविष्य के लिए तैयार हैं, जहां घड़ी 24 घंटे नहीं दिखाएगी? क्या वो समय भी आएगा जब ‘समय’ को नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा?

तो क्या यह संकेत है कि ब्रह्मांड के भीतर चल रही शक्तियां अब हमारे समय के ढांचे को भी बदलने लगी हैं? क्या आने वाला समय सच में छोटा होगा—या हम बस उसे नज़रअंदाज़ कर देंगे, जब तक वह हमें अपनी गिरफ्त में पूरी तरह न ले ले?

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