May 5, 2026

13 जुलाई: जब श्रीनगर की ज़मीन लाल हुई थी खून से, डोगरा राज की गोलियों से गूंजी थी अजान… क्या अब भी इन शहीदों की कुर्बानी को मजहबी चश्मे से देखा जाएगा?

13 जुलाई… एक तारीख जो कश्मीर के इतिहास में सिर्फ एक पन्ना नहीं, बल्कि एक लहूलुहान दस्तावेज़ है। यह दिन उस भयावह घटना की याद दिलाता है जब 1931 में श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर डोगरा शासन की गोलियों से 22 कश्मीरियों की जान चली गई थी। वे वहां किसी दंगे या हिंसा के लिए नहीं, बल्कि इंसाफ और न्याय की उम्मीद में जुटे थे। वे किसी नेता के भाषण के लिए नहीं, बल्कि अजान देने के लिए एक-एक कर आगे बढ़े थे। लेकिन हर बार जब किसी ने अजान शुरू की, तो उसे गोलियों से भून दिया गया। इस दिल दहला देने वाली घटना को कश्मीर के लोग हर साल शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन आज इतने सालों बाद भी जब इस दिन को राजनीतिक नजरिए से देखा जाता है, श्रद्धांजलि देने वालों को रोका जाता है, तो सवाल उठता है कि क्या इन शहीदों की पहचान अब सिर्फ उनके धर्म से जुड़कर रह गई है?

इस साल भी हालात कुछ अलग नहीं थे। घाटी में 13 जुलाई को लेकर प्रशासन हाई अलर्ट पर था। सुरक्षा के नाम पर नेताओं को नजरबंद किया गया, कई को कश्मीरी शहीदों की कब्रों तक जाने नहीं दिया गया। इनमें जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन भी शामिल थे, जिन्हें हिरासत में लिया गया। उन्होंने खुद सोशल मीडिया के ज़रिए यह जानकारी दी। वहीं, राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस दिन को लेकर गहरी प्रतिक्रिया दी और इसे कश्मीर की ‘जलियांवाला बाग’ कहा। उन्होंने कहा कि यह घटना ब्रिटिश हुकूमत और उसके स्थानीय सहयोगी डोगरा शासन के खिलाफ थी, और इसमें जान देने वाले वे लोग थे जिन्होंने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उमर अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि दुर्भाग्य है कि आज इन शहीदों को इसलिए खलनायक की तरह देखा जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान थे।

13 जुलाई 1931 की घटना कोई सामान्य प्रदर्शन नहीं था। श्रीनगर की सेंट्रल जेल के बाहर लोग एक जनसभा में जुटे थे, जहां एक व्यक्ति के खिलाफ ट्रायल चल रहा था। सभा के दौरान अजान देने की आवाज उठी और जैसे ही पहला व्यक्ति अजान के लिए आगे बढ़ा, उसे गोली मार दी गई। फिर दूसरा आया, उसे भी मारा गया। इसी तरह 22 लोग एक-एक कर आगे आए और अपनी जान दे दी, लेकिन अजान रुकी नहीं। यह नज़ारा डोगरा शासन की क्रूरता का सबसे खौफनाक उदाहरण बन गया। कश्मीरियों के लिए यह दिन संघर्ष, बलिदान और अपनी पहचान के लिए खड़े होने की मिसाल है।

लेकिन जिस तरह हर साल इस दिन को लेकर घाटी में प्रशासनिक शिकंजा कसता जा रहा है, राजनीतिक नेताओं को रोका जा रहा है, श्रद्धांजलियों को सीमित किया जा रहा है, उससे यह सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ सुरक्षा के नाम पर इतिहास को दबाने की कोशिश है? या फिर एक खास वर्ग की कुर्बानी को ‘मजहब’ से जोड़ कर कमतर दिखाने की कोशिश?

कश्मीर के लोग इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं क्योंकि इसे वह मोड़ माना जाता है जब पहली बार एक सामूहिक जनजागृति सत्ता के खिलाफ फूटी थी। इतिहासकारों की मानें तो यह घटना कश्मीर में राजनीतिक चेतना के उदय की शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर पूरे राज्य की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को तय किया। लेकिन आज, 94 साल बाद, जब नेताओं को नजरबंद कर दिया जाता है और श्रद्धांजलि अर्पित करने से रोका जाता है, तब यह सवाल उठता है कि क्या हम अपने ही इतिहास से भाग रहे हैं?

क्या हम यह भूल गए हैं कि जलियांवाला बाग में मारे गए लोग भी किसी एक धर्म के नहीं थे, बल्कि वे सब भारतीय थे? क्या हम यह तय करने लगे हैं कि किसी का बलिदान सिर्फ इस आधार पर बड़ा या छोटा होगा कि वह किस धर्म का था? उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि 13 जुलाई की घटना ‘कश्मीर की जलियांवाला बाग’ है, सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि अगर हम इतिहास को धर्म या राजनीति की चश्मे से देखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक अधूरा सच मिलेगा।

आज जरूरत इस बात की है कि हम 13 जुलाई 1931 की कुर्बानी को किसी भी राजनीतिक या धार्मिक खांचे में न डालें। यह दिन याद दिलाता है कि सत्ता चाहे कैसी भी हो, अगर वह जन-आवाज को कुचलने की कोशिश करती है, तो लोग एकजुट होकर उसका विरोध करते हैं—even at the cost of their lives. यह वो दिन है जिसने कश्मीर की राजनीति में जनचेतना की चिंगारी फूंकी थी, और आज जब उस चिंगारी को मिटाने की कोशिश हो रही है, तब इतिहास खुद पूछ रहा है — क्या यह वही आज़ाद भारत है, जिसके लिए उन 22 लोगों ने अपनी जान दी थी?

और आखिर में यही सवाल — क्या 13 जुलाई अब भी सिर्फ कश्मीर का दिन रह जाएगा या कभी पूरे भारत का वो दिन बन पाएगा जिसे पूरे देश की जनता अपने दिल से याद करे? क्या इन 22 शहीदों को भी वही सम्मान मिलेगा जो जलियांवाला बाग के शहीदों को मिला? या उनकी कुर्बानी सिर्फ घाटी के सीमित दायरे में सिमट कर रह जाएगी?

 

सीएम उमर ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि, ’13 जुलाई की घटना कश्मीर की जलियांवाला बाग है. इस दिन जिन्होंने अपनी जान दी, उनका संघर्ष उस ब्रिटिश हुकूमत और उसके सहयोगी डोगरा शासन के खिलाफ था, जिसके तहत कश्मीर ब्रिटिश पैरामाउंटसी के अधीन शासित हो रहा था. वे 22 कश्मीरी न सिर्फ अत्याचार के खिलाफ खड़े हुए, बल्कि अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर अपनी जान कुर्बान कर दी.”

उन्होंने कहा कि दुखद है कि आज उन सच्चे स्वतंत्रता सेनानियों को, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के हर रूप का विरोध किया, महज इसलिए खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान थे.

क्यों मनाया जाता है शहीद दिवस?
जम्मू-कश्मीर में 13 जुलाई को शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है. साल 1931 में डोगरा शासन के खिलाफ कश्मीरियों के संघर्ष और बलिदान को याद किया जाता है. 13 जुलाई 1931 के दिन श्रीनगर सेंट्रल जेल के बाहर 22 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. यहां एक जनसभा हो रही थी. इसी दौरान अजान देना शुरू किया गया तो डोगरा सैनिकों ने उस पर गोलियां चला दीं. जो भी व्यक्ति अजान के लिए आगे आया उसे गोली मार दी गई. यही कारण है कि इन शहीदों की स्मृति में 13 को हर साल शहीद दिवस मनाया जाता है.

हिरासत में लिए गए सज्जाद लोन
शहीद दिवस को लेकर प्रशासन मुस्तैद है. यही कारण है कि कई लोगों को नजरबंद तो कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है. जम्मू और कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (जेकेपीसी) के अध्यक्ष और हंदवाड़ा के विधायक सज्जाद गनी लोन को रविवार को कथित तौर पर हिरासत में लिया गया है. इस बात की जानकारी खुद उन्होंने दी है.

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