April 19, 2026

‘ये दवा है, दर्द तो होगा!’—ट्रंप के टैरिफ बम से थर्राया वैश्विक बाजार, क्या मंदी की दस्तक करीब है?

दुनिया की अर्थव्यवस्था के सिर पर इस वक्त एक अनिश्चितता की तलवार लटक रही है—और इसकी सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ नीति, जिसने ग्लोबल मार्केट में हड़कंप मचा दिया है। 2 अप्रैल को ट्रंप ने 60 देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने का ऐलान किया और उसके बाद से ही शेयर बाजारों में भूकंप जैसे हालात बन गए हैं।

ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे एशियाई देशों में 5-10% की गिरावट, चीन और हांगकांग में 10% से अधिक की मंदी, और अमेरिकी शेयर बाजार वॉल स्ट्रीट पर 12% तक की गिरावट—ये आंकड़े सिर्फ गिरावट नहीं, बल्कि एक आर्थिक तूफान का इशारा कर रहे हैं।

ट्रंप बोले, “दवा है तो कड़वी तो लगेगी ही”

जब मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रंप से सवाल किया कि उनके फैसले से दुनियाभर के शेयर बाजार क्यों ढह रहे हैं, तो ट्रंप ने चौंकाने वाला जवाब दिया

“मैं नहीं चाहता कि कुछ भी गिरे, लेकिन कभी-कभी आपको कुछ चीजों को ठीक करने के लिए दवा देनी ही पड़ती है।”

इस बयान ने साफ कर दिया कि ट्रंप अपनी नीति से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं, भले ही उसके नतीजे कितने भी भयावह क्यों न हों।

टैरिफ से किसे कितना झटका?

भारत: 26% टैरिफ के दायरे में ऑटो और अन्य उत्पाद

चीन: 34% टैरिफ, जवाबी कार्रवाई में चीन ने भी अमेरिकी सामान पर समान शुल्क लगाया

कनाडा: अमेरिकी वाहनों पर 25% टैरिफ

एशियाई बाजार: जापान में 10%, साउथ कोरिया में 5% और ऑस्ट्रेलिया में 6% तक गिरावट

अमेरिका: विशेषज्ञों की मानें तो वॉल स्ट्रीट में अभी 15-20% और गिरावट आ सकती है

क्या मंदी की आहट है ये?

बाजार के जानकारों का कहना है कि यह स्थिति 2008 की वैश्विक मंदी जैसी हो सकती है, अगर टैरिफ की यह जंग जल्द नहीं थमी। महंगाई की आशंका अब वास्तविक संकट बनती दिख रही है, क्योंकि आयातित सामानों पर शुल्क बढ़ने से कीमतें बढ़ना तय है। इससे उपभोक्ता खर्च घटेगा, निवेश रुकेगा और अंततः वैश्विक मंदी दस्तक दे सकती है।

डर और दहशत के बीच व्यापारी बेचैन

नए टैरिफ के डर से निवेशकों ने बड़ी मात्रा में पैसा बाजार से निकालना शुरू कर दिया है। अमेरिका के साथ-साथ एशियाई और यूरोपीय बाजारों में भी ट्रेडिंग वॉल्यूम में गिरावट देखी जा रही है। ट्रेड वॉर अब सिर्फ आंकड़ों की लड़ाई नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य पर छाया हुआ एक बड़ा सस्पेंस बन चुका है।

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