अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की मांग तेज करने के बीच यूरोपीय देश खुलकर सामने आ गए हैं। ट्रंप के बयानों और संभावित सैन्य विकल्पों के संकेत के बाद अब 8 यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ानी शुरू कर दी है। इसे ट्रंप की रणनीति के जवाब में यूरोप की एकजुट प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।
सबसे पहले डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में सैनिकों की तैनाती बढ़ाने का फैसला किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेनमार्क के करीब 100 सैनिक राजधानी नूक पहुंच चुके हैं, जबकि लगभग इतनी ही संख्या पश्चिमी ग्रीनलैंड के कांगेरलुस्सुआक में तैनात की गई है। डेनमार्क के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने बताया कि यह कदम क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोगी देशों के साथ समन्वय को मजबूत करने के लिए उठाया गया है। ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कोपेनहेगन के पास ही है।
डेनमार्क के अलावा जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, नॉर्वे, नीदरलैंड और फिनलैंड ने भी अपने-अपने सैन्य कर्मियों को ग्रीनलैंड भेजने की पुष्टि की है। जर्मनी ने डेनमार्क के निमंत्रण पर 13 सैन्य कर्मियों की एक टीम टोही मिशन के लिए भेजी है। वहीं, फ्रांस ने लगभग 15 सैनिक तैनात किए हैं। स्वीडन ने भी सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी है, जो आने वाले ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ की तैयारी में हिस्सा लेगी।
अन्य देशों की भागीदारी भी प्रतीकात्मक लेकिन रणनीतिक मानी जा रही है। नॉर्वे ने 2 रक्षा कर्मी, नीदरलैंड ने 1 नौसेना अधिकारी और ब्रिटेन ने 1 सैन्य अधिकारी को ग्रीनलैंड भेजा है। इन सभी देशों का कहना है कि यह तैनाती सहयोग, निगरानी और अभ्यास के उद्देश्य से की जा रही है, ताकि आर्कटिक क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।
इस पूरे घटनाक्रम पर ट्रंप ने नाराजगी जताते हुए चेतावनी दी है कि यूरोपीय देश “खतरनाक खेल” खेल रहे हैं। ट्रंप का दावा है कि डेनमार्क ग्रीनलैंड को रूस और चीन के संभावित खतरों से बचाने में नाकाम रहा है। हालांकि, डेनमार्क पहले ही ग्रीनलैंड की सुरक्षा के लिए अरबों क्रोन खर्च करने की घोषणा कर चुका है। ऐसे में ग्रीनलैंड अब अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक टकराव का नया केंद्र बनता दिख रहा है।
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