क्या 1980 जैसा दोहराएगी चांदी इतिहास, क्या वाकई आने वाली है 1 लाख रुपये तक की बड़ी गिरावट?
देश के वायदा बाजार से लेकर दिल्ली के सर्राफा बाजार तक चांदी इन दिनों रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना रही है। बीते एक महीने में चांदी की कीमतों में 50 फीसदी से ज्यादा की जबरदस्त तेजी देखने को मिली है और भाव 3 लाख रुपये प्रति किलो के स्तर को भी पार कर चुके हैं। हालांकि, इस बेतहाशा तेजी के बीच अब बाजार में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या चांदी की कीमतें यहां से फिसल सकती हैं और क्या 1980 जैसा बड़ा क्रैश दोबारा देखने को मिल सकता है?
कमोडिटी मार्केट के जानकारों का मानना है कि मौजूदा स्तर पर चांदी काफी ओवरवैल्यूड हो चुकी है। इंटरनेशनल मार्केट में चांदी का टारगेट 100 डॉलर प्रति औंस और घरेलू वायदा बाजार में 3.25 से 3.30 लाख रुपये प्रति किलो का स्तर बताया जा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर चांदी इन टारगेट्स को छूती है, तो इसके बाद भारी मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है, जिससे कीमतों में 30 फीसदी या उससे ज्यादा की गिरावट संभव है। इसका सीधा मतलब है कि चांदी के भाव मौजूदा ऊंचे स्तर से करीब 1 लाख रुपये तक नीचे आ सकते हैं।
गिरावट की बड़ी वजहों में सबसे पहला नाम टैरिफ टेंशन का है। हाल के महीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति के चलते ग्लोबल अनिश्चितता बढ़ी है, जिससे निवेशकों ने सेफ हेवन के तौर पर सोने और चांदी का रुख किया। लेकिन जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में टैरिफ को लेकर दबाव बढ़ सकता है और इनमें राहत मिलने की संभावना भी बन सकती है। अगर ऐसा होता है तो कीमती धातुओं से पैसा निकलकर दूसरे एसेट्स में जा सकता है।
दूसरा बड़ा फैक्टर डॉलर इंडेक्स है। बीते कुछ हफ्तों में डॉलर इंडेक्स में रिकवरी देखने को मिली है और अगर डॉलर और मजबूत होता है तो इसका सीधा असर चांदी की कीमतों पर पड़ेगा। आमतौर पर मजबूत डॉलर के दौर में मेटल्स पर दबाव बनता है। इसके अलावा गोल्ड-सिल्वर रेश्यो भी अहम संकेत दे रहा है। फिलहाल यह रेश्यो करीब 14 साल के निचले स्तर पर है, जो बताता है कि चांदी की कीमतें सोने के मुकाबले काफी तेजी से बढ़ चुकी हैं और अब यहां से संतुलन बनने की संभावना है।
निवेशकों के व्यवहार में बदलाव भी गिरावट की एक बड़ी वजह बन सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘मेटल्स रिप्लेसमेंट थ्योरी’ के तहत निवेशक अब चांदी की जगह कॉपर और एल्यूमीनियम जैसे दूसरे मेटल्स की ओर रुख कर सकते हैं। चांदी के दाम इतने ऊंचे हो चुके हैं कि यहां से रिटर्न की गुंजाइश सीमित नजर आ रही है। इसके अलावा इंडस्ट्रियल इस्तेमाल में भी चांदी के महंगे होने के चलते उसके विकल्प तलाशे जा रहे हैं, खासकर सोलर पैनल, ईवी और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में।
इतिहास पर नजर डालें तो 1980 और 2011 की घटनाएं निवेशकों को सतर्क करती हैं। साल 1980 में चांदी 50 डॉलर प्रति औंस के पीक पर पहुंचने के बाद सिर्फ दो महीनों में करीब 70 फीसदी टूट गई थी। वहीं 2011 में भी चांदी के दाम 50 डॉलर के आसपास पहुंचने के बाद अगले कुछ महीनों में 30 फीसदी से ज्यादा गिर गए थे। जानकारों का कहना है कि अगर इस बार भी चांदी 3.25 या 3.30 लाख रुपये के स्तर पर टिक नहीं पाती है, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
फिलहाल एमसीएक्स पर चांदी लाइफटाइम हाई के आसपास कारोबार कर रही है और बीते एक महीने में ही कीमतों में 1 लाख रुपये से ज्यादा की तेजी आ चुकी है। ऐसे में एक्सपर्ट्स निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। उनका मानना है कि मौजूदा स्तरों पर जोखिम काफी बढ़ गया है और आगे चलकर चांदी में बड़ा करेक्शन देखने को मिल सकता है।
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