तमिलनाडु करूर: विजय की रैली में भगदड़, 39 की मौत, सैकड़ों परिवार तबाह
तमिलनाडु के करूर में अभिनेता और नेता विजय की रैली मौत के मैदान में बदल गई। मंच से नेता भाषण दे रहे थे, लेकिन नीचे लोगों की चीखें, भगदड़ और मौत का तांडव चल रहा था। 39 मासूम लोगों ने दम तोड़ दिया… सैकड़ों परिवार बिखर गए। सवाल उठता है – इन लोगों का क्या कसूर था? क्या सिर्फ इतना कि वो अपने नेता को देखने और सुनने आए थे?
सरकार और प्रशासन दोनों पर सवाल खड़े हैं। जब आयोजकों ने कहा था कि भीड़ 10 हजार होगी, तो लाखों के लिए इंतज़ाम क्यों नहीं किए गए? क्यों सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के नाम पर सिर्फ दिखावा किया गया? आज 39 परिवारों की लाशें घर लौटी हैं और तमिलनाडु सरकार सिर्फ बयानबाजी और मुआवज़े का ऐलान कर रही है। क्या इन जिंदगियों की कीमत सिर्फ कुछ नोटों में तौली जाएगी?
हादसे में मारे गए लोग वो थे जो रोज़ दिहाड़ी करके घर चलाते थे, वो महिलाएं थीं जिनके बच्चों का सहारा अब छिन गया है, और वो मासूम बच्चे थे जिनकी दुनिया अभी शुरू भी नहीं हुई थी। सोचिए… एक राजनीतिक रैली के नाम पर लोगों को इस तरह मरने के लिए छोड़ दिया गया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सरकारी और प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है।
विजय ने सोशल मीडिया पर शोक जताया, मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने संवेदना प्रकट कर दी… लेकिन सवाल वही है – क्या संवेदनाओं और ट्वीट से इन परिवारों की ज़िंदगी वापस आएगी? क्या इस देश में हर त्रासदी के बाद नेताओं के “दुःख है, संवेदना है” वाले जुमले ही सुनने को मिलेंगे?
आज करूर के अस्पतालों में घायल जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। वहीं उनके घरों में मातम पसरा है। बच्चों की किलकारियां खामोश हो चुकी हैं, बुजुर्गों के सहारे छिन गए हैं। इनकी आंखों में सिर्फ यही सवाल है – आखिर उनकी मौत का जिम्मेदार कौन है?
ये हादसा सिर्फ एक राज्य की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक सबक है। अगर राजनीति के नाम पर भीड़ जुटाना है तो पहले सुरक्षा और इंसान की जान की कीमत समझनी होगी। लेकिन अफसोस… सत्ता की भूख और वोट की राजनीति में इंसान की जिंदगी हमेशा सबसे सस्ती साबित होती है। करूर की यह भगदड़ सिर्फ भीड़ प्रबंधन की चूक नहीं, बल्कि सरकार और सिस्टम की नाकामी का खुला सबूत है।
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