अफगानिस्तान में तालिबान का नया आदेश: अब लड़कियां और महिलाएं धार्मिक शिक्षा से भी वंचित
अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता को चार साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इस दौरान महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों पर लगातार शिकंजा कसता गया है। पहले ही मिडिल स्कूल, हाई स्कूल और विश्वविद्यालयों के दरवाज़े बंद कर दिए गए थे और अब तालिबानी सरगना हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने एक नया आदेश जारी करते हुए महिलाओं और लड़कियों के लिए धार्मिक शिक्षा पर भी प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। इसका मतलब है कि अब महिलाएं मदरसों में भी दाखिला नहीं ले पाएंगी और धीरे-धीरे उनका नामांकन खत्म कर दिया जाएगा। इस आदेश से अफगानिस्तान में बहस तेज हो गई है और तालिबानी कैबिनेट में गहरा मतभेद देखने को मिला है।
अल-अरेबिया की रिपोर्ट के अनुसार, कंधार में हुई कैबिनेट बैठक में अखुंदजादा ने शिक्षा मंत्रालय और उच्च शिक्षा मंत्रालय को निर्देश दिया कि महिला छात्रों को अब ग्रेजुएशन सर्टिफिकेट न दिए जाएं और समय रहते उन्हें धार्मिक स्कूलों से बाहर कर दिया जाए। सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला तब लिया गया जब अखुंदजादा को पता चला कि कई मदरसों में केवल इस्लामी शिक्षा ही नहीं, बल्कि गणित, विज्ञान और भाषाएं भी पढ़ाई जा रही हैं। यही वजह है कि उन्होंने कठोर रुख अपनाते हुए महिलाओं की शिक्षा पर नई रोक लगा दी।
इस आदेश के बाद तालिबानी मंत्रियों के बीच भारी मतभेद सामने आए। कुछ मंत्रियों ने कुरान और हदीस की आयतें पेश करते हुए दलील दी कि शिक्षा हासिल करना लड़के और लड़कियों दोनों के लिए बराबर जरूरी है। उनका मानना है कि यह फैसला न सिर्फ अफगानिस्तान के भीतर असंतोष को बढ़ाएगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तालिबान को और आलोचना झेलनी पड़ेगी। वहीं, अखुंदजादा ने पहले की तरह सवाल उठाया कि कोई स्पष्ट धार्मिक दलील बताए कि एक जवान लड़की घर से बाहर पढ़ाई करने क्यों जाए। इससे पहले जब विश्वविद्यालयों में लड़कियों के दाखिले पर रोक लगाई गई थी, तब भी उन्होंने यही तर्क दिया था।
बैठक के दौरान बहस इतनी गरम हो गई कि कुछ तालिबानी नेता खुलकर अपने मुखिया की आलोचना करने लगे। उनका कहना था कि इस तरह के कठोर फैसले तालिबान के भीतर असहमति को जन्म देंगे और शासन कमजोर हो जाएगा। यहां तक कि कुछ नेताओं को शक है कि अखुंदजादा किसी विदेशी एजेंडे के तहत जानबूझकर तालिबान की सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं। इस विवाद ने तालिबानी कैबिनेट में गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
गौरतलब है कि 15 अगस्त 2021 को अमेरिका की फौजों के हटने के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था। उस समय उम्मीद थी कि शायद तालिबान पिछली बार से अलग रुख अपनाएगा, लेकिन चार साल बाद हालात और खराब हो गए हैं। शरिया कानून की सख्त व्याख्या के तहत महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्र जीवन से वंचित किया जा रहा है। छठी कक्षा के बाद लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी गई, नौकरी के अवसर लगभग खत्म हो गए और घर से बाहर निकलने पर भी कई प्रतिबंध लागू कर दिए गए। संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लगातार तालिबान की आलोचना कर रहे हैं, लेकिन अब तक इस रवैये में कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है।
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