उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ओवरलोडिंग वाहनों के नाम पर होने वाली अवैध वसूली का बड़ा खुलासा हुआ है। इस भ्रष्टाचार नेटवर्क में परिवहन विभाग के कई अधिकारी शामिल पाए गए हैं, जिसके बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। एसटीएफ की कार्रवाई शुरू होते ही कई अधिकारी अचानक छुट्टी पर चले गए और उनके फोन भी बंद हो गए हैं, जिससे जांच प्रभावित हो रही है।
11 नवंबर की रात मड़ियांव पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त टीम ने इस सिंडिकेट का पर्दाफाश किया। कार्रवाई में दलाल अभिनव पांडे और डंपर चालक कपिल को गिरफ्तार किया गया। जांच में सामने आया कि आईआईएम रोड पर ओवरलोडेड वाहनों को रोकने की बजाय उनसे मोटी रकम लेकर पास करवाया जाता था। प्रति वाहन 7,000 रुपये वसूले जाते थे, जिसमें से 5,000 से 6,000 रुपये विभाग के अधिकारियों में बांटे जाते थे। इस पूरी व्यवस्था का रिकॉर्ड बाकायदा एक रजिस्टर में दर्ज किया जाता था।
एसटीएफ ने जांच में एआरटीओ राजू बंसल, पीटीओ मनोज भारद्वाज समेत कुल 9 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया है। गिरफ्तार दलाल के बयान के बाद कई और अधिकारी संदेह के दायरे में आ गए हैं। जांच से बचने के लिए फतेहपुर, उन्नाव, लखनऊ, रायबरेली और बाराबंकी के कई अधिकारी अचानक छुट्टी पर चले गए और उनके फोन स्विच ऑफ हो गए हैं, जिससे उनकी मंशा पर सवाल उठने लगे हैं।
इस मामले ने यह भी उजागर किया है कि लखनऊ में रोजाना करीब 1,500 ओवरलोड वाहन आते-जाते हैं, लेकिन कार्रवाई बेहद नाममात्र की होती थी। रिकॉर्ड के अनुसार, सिर्फ अक्टूबर में 46,000 ओवरलोड वाहन गुजरे, लेकिन चालान केवल 51 हुए और 31 वाहनों को सीज किया गया। पिछले छह महीनों में करीब 16.20 लाख ओवरलोड वाहन राज्य की सड़कों से गुजरे, लेकिन कार्रवाई बेहद कम रही, जिससे भ्रष्टाचार की गहराई का अंदाजा लगाया जा सकता है।
जांच के बाद अब स्पष्ट है कि यह सिर्फ अवैध कमाई का खेल नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क था, जिसमें अधिकारी, दलाल और वाहन संचालक शामिल थे। एसटीएफ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच तेज कर दी है और जल्द ही और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। यह मामला यूपी परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली और ईमानदारी पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
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