अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय सियासत के केंद्र में हैं। ट्रंप खुले तौर पर कह चुके हैं कि अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ग्रीनलैंड पर नियंत्रण चाहिए, चाहे इसके लिए किसी भी स्तर तक जाना पड़े। हालांकि ग्रीनलैंड और उसके अधीनस्थ देश डेनमार्क इस मांग को सिरे से खारिज कर चुके हैं। इसके बावजूद ट्रंप की लगातार बयानबाजी ने इस सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है कि आखिर ग्रीनलैंड में ऐसा क्या है, जो अमेरिका के लिए उसे ‘सोने की चिड़िया’ बना देता है।
भौगोलिक दृष्टि से ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में स्थित दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है। इसका क्षेत्रफल लगभग 22 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो जर्मनी से करीब छह गुना बड़ा है, लेकिन आबादी महज 56 हजार के आसपास है। इसकी लोकेशन इसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बनाती है। उत्तर अमेरिका और आर्कटिक के बीच स्थित होने के कारण यहां से मिसाइल लॉन्च या किसी संभावित हमले की निगरानी आसानी से की जा सकती है। अमेरिका पहले से ही यहां पिटुफिक स्पेस बेस संचालित करता है, जिसे पहले थुले एयर बेस कहा जाता था और आज इसका इस्तेमाल मिसाइल चेतावनी प्रणाली के लिए किया जाता है।
डिफेंस के अलावा ग्रीनलैंड की बढ़ती अहमियत का दूसरा बड़ा कारण उसके प्राकृतिक संसाधन हैं। करीब 80 प्रतिशत हिस्सा बर्फ से ढका होने के बावजूद, जलवायु परिवर्तन और बर्फ के पिघलने के साथ यहां दुर्लभ पृथ्वी खनिज, यूरेनियम, लोहा और अन्य कीमती धातुओं के बड़े भंडार सामने आ रहे हैं। माना जाता है कि यहां तेल और गैस के भी विशाल भंडार मौजूद हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में ये संसाधन वैश्विक अर्थव्यवस्था और रक्षा उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यही वजह है कि अमेरिका के साथ-साथ रूस और चीन की भी नजरें आर्कटिक क्षेत्र पर टिकी हुई हैं।
ट्रंप बार-बार यह आशंका जता चुके हैं कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन वहां अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। यही तर्क उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का मुख्य आधार है। हालांकि ग्रीनलैंड और डेनमार्क दोनों ही स्पष्ट कर चुके हैं कि यह द्वीप न तो बिकाऊ है और न ही किसी दबाव में आने वाला है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स फ्रेडरिक नीलसन ने अमेरिकी दावों को कल्पना करार देते हुए साफ कहा है कि ग्रीनलैंड के भविष्य का फैसला केवल वहां के लोग करेंगे।
इतिहास पर नजर डालें तो अमेरिका की दिलचस्पी नई नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी के डेनमार्क पर कब्जे के बाद अमेरिका ने ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी स्थापित की थी। 1951 के रक्षा समझौते के तहत अमेरिका को यहां सैन्य अड्डे बनाने का अधिकार मिला, जो आज भी जारी है। 1979 में ग्रीनलैंड को आंतरिक स्वशासन मिला, लेकिन विदेश नीति और रक्षा अब भी डेनमार्क के अधीन हैं।
हालिया सर्वे बताते हैं कि ग्रीनलैंड के करीब 85 प्रतिशत लोग अमेरिका में शामिल होने के खिलाफ हैं। सड़कों पर ‘ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है’ जैसे नारे गूंज रहे हैं। ऐसे में ट्रंप की जिद ने न सिर्फ डेनमार्क-अमेरिका संबंधों में तनाव बढ़ाया है, बल्कि नाटो जैसे गठबंधनों के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। साफ है कि ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि आने वाले दौर की वैश्विक ताकत और संसाधनों की राजनीति का अहम केंद्र बन चुका है।
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