April 17, 2026

बंगाल के बाद अब यूपी में भी SIR में ‘सामान्य निवास प्रमाणपत्र’ अमान्य, मतदाता सूची में नाम जुड़वाने में बढ़ी दिक्कतें

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर उठे विवाद के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी चुनाव आयोग के एक फैसले ने हजारों मतदाताओं की परेशानी बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश में चल रहे SIR अभियान के तहत चुनाव आयोग ने ‘सामान्य निवास प्रमाणपत्र’ को मान्य दस्तावेज मानने से इनकार कर दिया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने या सत्यापन के लिए केवल ‘स्थायी निवास प्रमाणपत्र’ ही स्वीकार किया जाएगा। इस फैसले के चलते ऐसे मतदाता असमंजस में हैं, जिनके पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र नहीं है और जो सरकारी योजनाओं में वर्षों से सामान्य निवास प्रमाणपत्र का उपयोग करते आ रहे हैं।

 

उत्तर प्रदेश में SIR अभियान इस समय अपने अंतिम चरण में है और 6 फरवरी को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित होनी है। इससे पहले उन मतदाताओं को एक महीने का समय दिया गया था, जिनके नाम किसी कारणवश मतदाता सूची से छूट गए थे। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि अब तक ऐसे छूटे हुए कुल मतदाताओं में से केवल लगभग 25 प्रतिशत ने ही फॉर्म-6 के जरिए आवेदन किया है। चुनाव आयोग द्वारा सामान्य निवास प्रमाणपत्र को खारिज किए जाने के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाता भी ड्राफ्ट सूची से बाहर रह सकते हैं।

 

चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत मैपिंग सत्यापन के लिए 13 दस्तावेजों की एक सूची जारी की है। इस सूची में सक्षम राज्य प्राधिकारी द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाणपत्र को मान्य दस्तावेजों में शामिल किया गया है, लेकिन सामान्य निवास प्रमाणपत्र का उल्लेख नहीं है। समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश में बीते कुछ वर्षों से तहसील और जिला स्तर पर स्थायी या मूल निवास प्रमाणपत्र अलग से जारी नहीं किए जा रहे हैं। प्रशासनिक स्तर पर अब छात्रवृत्ति, पेंशन और अन्य सरकारी योजनाओं के लिए केवल सामान्य निवास प्रमाणपत्र ही बनाया जाता है, जिसे सभी विभाग मान्य मानते हैं। ऐसे में SIR में इसे अमान्य ठहराया जाना मतदाताओं के लिए बड़ी व्यावहारिक चुनौती बन गया है।

 

प्रदेश के कई जिलों में लेखपालों और स्थानीय अधिकारियों ने भी यह पुष्टि की है कि उनके स्तर पर केवल सामान्य निवास प्रमाणपत्र ही जारी किया जाता है। अधिकारियों का कहना है कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से स्पष्ट निर्देश हैं कि SIR में स्थायी निवास प्रमाणपत्र के अलावा किसी अन्य प्रकार का निवास प्रमाण मान्य नहीं होगा। इस कारण निचले स्तर पर कार्यरत कर्मचारी भी इसमें कोई छूट नहीं दे पा रहे हैं, जिससे आम मतदाता परेशान होकर कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।

 

इस पूरे मामले पर उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने स्पष्ट किया है कि सामान्य निवास प्रमाणपत्र किसी स्थान पर केवल कुछ महीनों के निवास के आधार पर भी जारी हो जाता है। उनके अनुसार, SIR का उद्देश्य लंबे समय से किसी क्षेत्र में रह रहे वास्तविक मतदाताओं की पहचान करना है, ताकि मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और अद्यतन बनाया जा सके। इसी वजह से आयोग ने स्थायी निवास प्रमाणपत्र को ही मान्य दस्तावेज के रूप में शामिल किया है और सामान्य निवास प्रमाणपत्र को स्वीकार न करने का निर्णय लिया गया है। चुनाव आयोग का कहना है कि नियमों में बदलाव किए बिना इस पर पुनर्विचार संभव नहीं है, हालांकि जमीनी स्तर पर यह फैसला मतदाताओं की मुश्किलें लगातार बढ़ा रहा है।

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