शेख हसीना के राजनीति से संन्यास के संकेत, बांग्लादेश की सत्ता राजनीति और भारत-बांग्लादेश रिश्तों के लिए क्या होंगे मायने
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और अवामी लीग की सबसे प्रभावशाली नेता शेख हसीना के राजनीति से संन्यास लेने के संकेत ने दक्षिण एशियाई राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। उनके बेटे सजीब वाजेद जॉय के हालिया बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि बांग्लादेश की राजनीति में एक लंबे और प्रभावशाली दौर का अंत होने जा रहा है। शेख हसीना दशकों तक बांग्लादेश की राजनीति का केंद्र रहीं और उन्होंने न सिर्फ देश की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाई, बल्कि भारत के साथ संबंधों को भी एक नई दिशा दी। ऐसे में उनका राजनीति से हटना केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय रिश्तों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है।
सजीब वाजेद जॉय के अनुसार, शेख हसीना पहले ही यह फैसला कर चुकी थीं कि यह उनका आखिरी कार्यकाल होगा। बढ़ती उम्र और लगातार राजनीतिक दबावों के बीच उन्होंने राजनीति और चुनावी सक्रियता से दूरी बनाने का मन बना लिया था। हालांकि, बांग्लादेश में छात्रों के बड़े पैमाने पर हुए विद्रोह और उसके बाद पैदा हुए हालात के कारण उन्हें इस फैसले की औपचारिक घोषणा करने का अवसर नहीं मिल सका। अगस्त 2024 में हुए छात्र आंदोलन के बाद हालात इतने बिगड़े कि शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद छोड़कर देश से बाहर जाना पड़ा और भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद से ही वे सक्रिय राजनीति से लगभग दूर ही नजर आईं।
शेख हसीना के संन्यास को लेकर सबसे बड़ा सवाल अवामी लीग के भविष्य को लेकर उठ रहा है। बांग्लादेश में जल्द ही चुनाव होने हैं, लेकिन अवामी लीग पर चुनाव आयोग द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के कारण पार्टी चुनावी मैदान में नहीं उतर पाएगी। ऐसे में यह आशंका जताई जा रही है कि क्या शेख हसीना के बिना अवामी लीग कमजोर पड़ जाएगी। हालांकि, उनके बेटे का कहना है कि अवामी लीग बांग्लादेश की सबसे पुरानी और मजबूत राजनीतिक पार्टी है, जिसका इतिहास लगभग सात दशकों का है। उनके अनुसार, पार्टी किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है और शेख हसीना के रिटायरमेंट से उसकी लीडरशिप या अस्तित्व पर कोई निर्णायक असर नहीं पड़ेगा।
दूसरी ओर, शेख हसीना के कार्यकाल और छात्र आंदोलन को लेकर गंभीर आरोप भी लगे हैं। दावा किया गया है कि आंदोलन के दौरान सैकड़ों नहीं बल्कि हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों की मौत हुई और शेख हसीना पर छात्रों पर बल प्रयोग का आदेश देने के आरोप लगे। बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल द्वारा उन्हें गंभीर सजाएं सुनाए जाने की खबरों ने इस विवाद को और गहरा कर दिया। हालांकि, सजीब वाजेद जॉय ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उनकी मां की बातों को गलत तरीके से पेश किया गया और उन्होंने कभी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश नहीं दिया।
भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिहाज से शेख हसीना का संन्यास एक अहम मोड़ माना जा रहा है। फिलहाल वे भारत में रह रही हैं और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार लगातार उनके प्रत्यार्पण की मांग करती रही है। भारत ने इस मांग पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन बांग्लादेश की राजनीति में शेख हसीना की मौजूदगी को लेकर तनाव बना रहा है। यदि वे औपचारिक रूप से राजनीति से संन्यास ले लेती हैं, तो भारत पर उन्हें संरक्षण देने के आरोप कमजोर पड़ सकते हैं। ऐसे में आने वाले चुनावों के बाद बांग्लादेश में बनने वाली नई सरकार के साथ भारत के रिश्तों में सुधार की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। कुल मिलाकर, शेख हसीना का राजनीतिक संन्यास न केवल बांग्लादेश की सत्ता संरचना को बदलेगा, बल्कि पूरे क्षेत्रीय समीकरणों पर इसका दूरगामी असर देखने को मिल सकता है।
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