शिबू सोरेन को क्यों कहा गया ‘दिशोम गुरु’, जानिए कैसे बने आदिवासियों की आवाज
झारखंड आंदोलन के प्रणेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन का 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। 81 वर्षीय सोरेन लंबे समय से बीमार थे और 19 जून से अस्पताल में भर्ती थे। उनके निधन से न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। उन्हें ‘दिशोम गुरु’ यानी ‘देश का गुरु’ कहा जाता था — यह उपाधि उन्हें आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई में उनके नेतृत्व और बलिदान के लिए मिली।
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को बिहार (अब झारखंड) के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने पिता को खोया, जिन्हें महाजनों ने मार दिया था। इस घटना ने उन्हें झकझोर कर रख दिया और यहीं से उन्होंने आदिवासी समुदाय के शोषण के खिलाफ लड़ाई शुरू की। उन्होंने महाजनी प्रथा और सूदखोरों के खिलाफ कई अभियान चलाए। ‘जमीनों धान काटो’ जैसे जनांदोलन के ज़रिए उन्होंने आदिवासियों को अपने अधिकारों के लिए जागरूक और संगठित किया।
1972 में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखी, जिसने आदिवासियों के अधिकार और झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। 1980 में वे दुमका से पहली बार लोकसभा सांसद चुने गए और झारखंड मुक्ति मोर्चा के पहले सांसद बने। इसके बाद उन्होंने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई को और तेज किया। 15 नवंबर 2000 को जब झारखंड राज्य का गठन हुआ, तब यह उनका सबसे बड़ा सपना साकार हुआ।
राजनीतिक जीवन में शिबू सोरेन का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने — पहली बार 2005 में (हालांकि सिर्फ 10 दिनों के लिए), फिर 2008 और अंत में 2009 में। इसके अलावा वे आठ बार लोकसभा सांसद और केंद्र सरकार में तीन बार कोयला मंत्री भी रहे।
‘दिशोम गुरु’ की उपाधि उन्हें संथाली भाषा से मिली, जिसमें ‘दिशोम’ का अर्थ है देश या समुदाय और ‘गुरु’ का मतलब होता है मार्गदर्शक। यह उपाधि उनके संघर्ष और नेतृत्व को आदिवासी समाज द्वारा दी गई थी, जो अब एक ऐतिहासिक पहचान बन चुकी है।
शिबू सोरेन ने जिस आंदोलन की शुरुआत की थी, उसे अब उनके पुत्र हेमंत सोरेन आगे बढ़ा रहे हैं। शिबू सोरेन का जीवन आदिवासी अस्मिता, संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया है। उनका जाना झारखंड के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
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