संभल की शाही जामा मस्जिद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, रंगाई-पुताई की इजाजत नहीं
संभल की शाही जामा मस्जिद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मस्जिद में रंगाई-पुताई की इजाजत नहीं दी और कहा कि फिलहाल केवल साफ-सफाई की जाए, इस मस्जिद में रंगाई-पुताई की कोई आवश्यकता नहीं है। कोर्ट का यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर आया, जिसमें यह सुझाव दिया गया था कि मस्जिद की संरचना की मूल स्थिति को बनाए रखते हुए उसकी साफ-सफाई की जाए।
एएसआई की रिपोर्ट के आधार पर फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि मस्जिद में किसी भी प्रकार की रंगाई-पुताई की इजाजत नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट के बाद यह पाया गया कि इस धार्मिक स्थल को केवल साफ-सुथरा किया जाए और उसकी मौजूदा संरचना में किसी भी प्रकार का बदलाव न किया जाए।
अदालत ने मस्जिद कमेटी को आदेश दिया कि वह एएसआई की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया 17 मार्च, मंगलवार तक प्रस्तुत करें। इस मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी। कोर्ट का यह फैसला इस संवेदनशील मसले पर सुनवाई कर रहे न्यायालय के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित रखने की दिशा में एक नया मार्गदर्शन मिला है।
क्या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा मामला?
संभल की मस्जिद कमेटी को इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार है। मुस्लिम पक्ष को अब तक का समय दिया गया है और यदि वे इस फैसले से असंतुष्ट हैं, तो वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। हालांकि, मस्जिद कमेटी के पास सिर्फ आज का दिन ही बचा है, क्योंकि रमजान का महीना शुरू होने की संभावना है। चांद देखने की प्रक्रिया के साथ ही मुस्लिम समुदाय में रमजान के आगमन की चर्चा हो रही है, जिससे यह मामला और भी संवेदनशील बन गया है।
न्यायालय का संतुलित दृष्टिकोण
इस मामले में न्यायालय ने धार्मिक भावनाओं और ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश की है। कोर्ट का कहना था कि मस्जिद में रंगाई-पुताई से उसकी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता पर असर पड़ सकता है, और इसीलिए इसे स्थगित किया गया है। हालांकि, साफ सफाई के लिए एएसआई के दिशा-निर्देशों के तहत कार्यवाही की जाएगी।
अब यह देखना होगा कि मस्जिद कमेटी इस फैसले पर क्या कदम उठाती है। क्या वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे या फिर कोर्ट द्वारा दी गई समय सीमा के अंदर कोई अन्य प्रतिक्रिया देंगे। इस मामले का राजनीतिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भी गहरा असर हो सकता है, और इससे जुड़ी सभी गतिविधियां देशभर में चर्चा का विषय बन सकती हैं।
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