जिनके हाथों बना ‘संसार विनाशक’: रॉबर्ट ओपेनहाइमर की कहानी, जो तीसरे विश्व युद्ध की वजह बन सकती है
ईरान-इजरायल युद्ध की बढ़ती आग के बीच परमाणु बम फिर से वैश्विक चर्चा का केंद्र बन चुका है। और इसी हथियार की जड़ तक पहुंचें, तो एक नाम सामने आता है—रॉबर्ट ओपेनहाइमर। वही शख्स जिन्होंने दुनिया का पहला एटॉमिक बम बनाया। जिस दिन यह बम फटा, उसी दिन मानव इतिहास की दिशा बदल गई। ओपेनहाइमर को इसी लिए कहा गया—“डेस्ट्रॉयर ऑफ वर्ल्ड्स”, यानी संसार का संहारक।
16 जुलाई 1945 को न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में, ओपेनहाइमर ने मानव इतिहास का सबसे खतरनाक प्रयोग देखा—पहला परमाणु परीक्षण। परीक्षण के वक्त वे एक बंकर में थे, लेकिन जैसे ही बम फटा, उनके चेहरे पर राहत की झलक थी। बाद में उन्होंने कहा कि उस क्षण उन्हें भगवद्गीता की एक पंक्ति याद आई—“मैं काल हूं, लोकों का संहारक।”
हालांकि, यह विजय क्षणिक थी। कुछ ही हफ्तों में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु हमलों ने लाखों लोगों की जान ले ली। और इसके बाद ओपेनहाइमर की आत्मा विचलित हो उठी। वे उदास रहने लगे। उन्होंने खुद कहा—“मुझे लगता है मेरे हाथों पर खून है।” उन्होंने माना कि वैज्ञानिकों को हथियार बनाना चाहिए या नहीं, इस पर भी नैतिक जिम्मेदारी है।
रॉबर्ट ओपेनहाइमर का जन्म 1904 में न्यूयॉर्क के एक अमीर यहूदी परिवार में हुआ था। पढ़ाई में बेजोड़ और चिंतनशील स्वभाव के ओपेनहाइमर ने लॉस एलामोस में ‘मैनहैटन प्रोजेक्ट’ का नेतृत्व किया, जो अमेरिका का परमाणु हथियार कार्यक्रम था। लेकिन जिस बम ने उन्हें प्रसिद्धि दी, वही उनके अंतर्मन को भीतर से तोड़ता रहा। युद्ध के बाद वे अमेरिका की परमाणु नीतियों के आलोचक बन गए और हथियार उद्योग को “शैतान का काम” करार दिया।
अगर इतिहास में थोड़ा फेरबदल होता—ओपेनहाइमर नहीं होते—तो शायद दुनिया आज इतनी बड़ी परमाणु ताकतों में बंटी न होती। जानकार मानते हैं कि अगर ओपेनहाइमर लॉस एलामोस के निदेशक न बने होते, तो संभव है कि दूसरा विश्व युद्ध परमाणु बम के बिना ही खत्म हो जाता।
आज जब ईरान और इजरायल जैसे देश परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं, तब ओपेनहाइमर की कहानी फिर से प्रासंगिक हो गई है। यह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है—कि जिस हथियार ने युद्ध को खत्म किया, वही कभी अगला महायुद्ध शुरू कर सकता है।
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