प्रयागराज माघ मेला विवाद: कौन हैं ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, जिन पर उठे पद की वैधता के सवाल
संगम नगरी प्रयागराज में चल रहा माघ मेला इन दिनों आस्था के साथ विवादों का केंद्र बन गया है। मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन आमने-सामने आ गए। भीड़ प्रबंधन के नाम पर प्रशासन ने उनके रथ–पालकी के साथ आगे बढ़ने पर रोक लगाई, जिसके बाद हालात तनावपूर्ण हो गए और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्नान से इनकार कर धरना दिया।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ। मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने गुजरात और वाराणसी में संस्कृत व शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री व आचार्य की उपाधि प्राप्त की। 15 अप्रैल 2003 को दंड संन्यास की दीक्षा के साथ उन्हें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती नाम मिला।
धर्म के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर भी वे मुखर रहे हैं। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग, गौ-रक्षा, मंदिरों की स्वायत्तता और जोशीमठ भूमि धंसाव पर सुप्रीम कोर्ट में PIL जैसे कदमों से वे अक्सर चर्चा में रहे। सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उन्हें ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य घोषित किया गया, लेकिन इस पद को लेकर कानूनी विवाद भी चल रहा है।
माघ मेले के ताज़ा विवाद में प्रशासन ने नोटिस जारी कर उनके शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल उठाए हैं, जबकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि शंकराचार्य पद का निर्णय परंपराएं करती हैं, न कि प्रशासन या राजनीति। फिलहाल मामला गरमाया हुआ है और माघ मेला आस्था के साथ टकराव का अखाड़ा बना हुआ है।
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