वैश्विक राजनीति और आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारतीय शेयर बाजार और रुपये पर एक साथ बड़ा दबाव देखने को मिला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के यूरोप और नाटो देशों को लेकर सख्त रुख, ग्रीनलैंड विवाद और नए टैरिफ की धमकियों का असर सीधे वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारत पर भी पड़ा है। नतीजा यह रहा कि लगातार तीसरे दिन शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई और रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। तीन कारोबारी सत्रों में निवेशकों की संपत्ति में करीब 17.82 लाख करोड़ रुपये की बड़ी सेंध लग चुकी है।
बुधवार को बाजार खुलते ही कमजोरी के संकेत मिलने लगे थे, लेकिन जैसे-जैसे कारोबार आगे बढ़ा, गिरावट और गहरी होती चली गई। सुबह करीब साढ़े दस बजे सेंसेक्स अचानक फिसल गया और खबर लिखे जाने तक यह लगभग 800 अंकों से ज्यादा टूटकर 81,380 के आसपास कारोबार करता दिखा। निफ्टी 50 में भी करीब 220 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। अगर पिछले तीन दिनों का आंकड़ा देखें तो 16 जनवरी को सेंसेक्स जहां 83,570 अंकों पर था, वहीं अब तक इसमें करीब 2,446 अंकों की गिरावट आ चुकी है। इसी तरह निफ्टी 25,694 के स्तर से फिसलकर करीब 775 अंक नीचे आ गया है।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह वैश्विक स्तर पर बढ़ता तनाव माना जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों और यूरोपीय संघ पर नए टैरिफ लगाने की चेतावनियों ने निवेशकों को डरा दिया है। अमेरिका में भी इसका असर दिखा, जहां मंगलवार को वॉल स्ट्रीट करीब डेढ़ फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुआ। वैश्विक निवेशकों में एक बार फिर “सेल अमेरिका ट्रेड” का डर बढ़ गया है, जिसके चलते वे जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की ओर भाग रहे हैं। इसी वजह से सोने और चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं।
घरेलू मोर्चे पर भी बाजार को ज्यादा सहारा नहीं मिला। तिमाही नतीजों का सीजन उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं रहा। रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईसीआईसीआई बैंक जैसी बड़ी कंपनियों के नतीजे निवेशकों को निराश कर गए, जिससे यह चिंता गहराई कि शेयरों के दाम कंपनियों की वास्तविक कमाई से कहीं आगे निकल चुके हैं। आईटी सेक्टर सबसे ज्यादा दबाव में दिखा और आईटी इंडेक्स करीब 1 फीसदी टूट गया। कुछ कंपनियों में मुनाफा बढ़ने के बावजूद शेयर गिरे, क्योंकि आगे के लिए अनुमान कमजोर माने जा रहे हैं।
इसी बीच भारतीय रुपया भी ऐतिहासिक दबाव में आ गया। बुधवार को रुपया डॉलर के मुकाबले 91.29 के आसपास फिसल गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इस महीने ही रुपया करीब 1.5 फीसदी टूट चुका है, जबकि 2025 में इसमें पहले ही करीब 5 फीसदी की गिरावट दर्ज हो चुकी थी। विदेशी पूंजी का लगातार बाहर जाना, वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और अमेरिका-भारत व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता ने रुपये की कमजोरी को और बढ़ा दिया है। हालांकि रिजर्व बैंक ने जरूरत के मुताबिक बाजार में दखल दिया, लेकिन किसी खास स्तर पर रुपये को थामने की कोशिश नहीं की।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली ने बाजार की हालत और खराब कर दी है। विदेशी निवेशक लगातार ग्यारहवें दिन शुद्ध बिकवाल रहे और सिर्फ 20 जनवरी को ही उन्होंने करीब 2,938 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। घरेलू संस्थागत निवेशकों ने कुछ हद तक खरीदारी कर संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन वह गिरावट को रोकने के लिए नाकाफी साबित हुई। इन सबका नतीजा यह हुआ कि बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप घटकर करीब 449.76 लाख करोड़ रुपये रह गया। मौजूदा हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि जब तक वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता कम नहीं होती, तब तक बाजार और निवेशकों की मुश्किलें बनी रह सकती हैं।
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