पश्चिम बंगाल के हकीमपुर बॉर्डर पर घुसपैठियों की भीड़ क्यों लौट रही है? SIR का खौफ या ममता बनर्जी की सियासी रणनीति?
पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के हकीमपुर बॉर्डर से इन दिनों जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उन्होंने पूरे राज्य में हलचल मचा दी है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बड़ी संख्या में अवैध रूप से भारत में बसे बांग्लादेशी नागरिक अपने परिवारों के साथ बॉर्डर पोस्ट पर वापस लौटते दिखाई दे रहे हैं। इनमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे शामिल हैं, जो बीएसएफ से बांग्लादेश भेजे जाने की गुहार लगा रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि राज्य में चल रही SIR (शुद्ध मतदाता सूची प्रक्रिया) के कारण ये लोग भयभीत हैं और देश से निकाले जाने के डर से स्वयं ही लौटने को मजबूर हो रहे हैं। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में यह मुद्दा तेजी से राजनीतिक रंग भी पकड़ रहा है।
इन खबरों के बाद राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने तुरंत हकीमपुर बॉर्डर आउटपोस्ट का दौरा किया और स्थिति का प्रत्यक्ष रूप से जायज़ा लिया। दिलचस्प बात यह रही कि जिस दिन राज्यपाल पहुंचे, उस दिन बॉर्डर पर लौटने वालों का कोई समूह नहीं दिखाई दिया। न वहां भीड़ थी और न ही कतारें, जिनका वीडियो पिछले दिनों वायरल हुआ था। लेकिन राज्यपाल के लौटते ही फिर एक बार अवैध बांग्लादेशियों की भीड़ बॉर्डर पर उमड़ पड़ी, जो लगातार वापस बांग्लादेश भेजे जाने की मांग कर रहे थे। इन लोगों का कहना है कि वे वर्षों पहले अवैध रूप से भारत आए थे, लेकिन अब SIR प्रक्रिया के चलते आशंकित हैं क्योंकि 2002-03 की सूची में उनके परिवार का नाम नहीं है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पूरा मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हजारों बांग्लादेशी शरणार्थी 1971 में स्वतंत्रता के बाद भारत आए थे और उन्हें उत्बास्तु कॉलोनियों में बसाया गया। बाद में भी लंबे समय तक अवैध रूप से घुसपैठ होती रही और इनमें से कई लोगों के पास आधार, पैन कार्ड, यहां तक कि संपत्ति भी मौजूद है। विश्लेषक कहते हैं कि SIR से केवल चुनावी सूची की जांच हो रही है, किसी को देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया इसमें शामिल नहीं है। साथ ही, पासपोर्ट, डोमिसाइल सहित 12 प्रकार के दस्तावेज ऐसे हैं जिनसे कोई भी मतदाता सूची में अपना नाम जोड़वा सकता है। इसलिए “डर के कारण अचानक रिवर्स माइग्रेशन” के दावों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
राज्य की राजनीति में यह मुद्दा अब सियासी हथियार बन चुका है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे सीधे एनआरसी और सीएए जैसा बता रही हैं और आरोप लगा रही हैं कि केंद्र सरकार विशेष समुदाय को निशाना बना रही है। उनका कहना है कि SIR के नाम पर भय का माहौल बनाया जा रहा है, जिससे कई मुस्लिम और बांग्लादेशी मूल के परिवार डरे हुए हैं। दूसरी ओर, भाजपा लगातार आरोप लगा रही है कि ममता जानबूझकर गलत जानकारी फैला रही हैं ताकि अपने “अवैध वोट बैंक” को बचा सकें। नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि ममता बनर्जी SIR को किसी भी हाल में रोक नहीं पाएंगी, इसलिए वह चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव अधिकारी पर व्यक्तिगत हमले कर रही हैं।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश बॉर्डर पर बढ़ती भीड़ का सच क्या है — SIR की प्रक्रिया का डर या चुनावी रणनीति — यह अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना तय है कि बंगाल के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और बड़ा होने वाला है।
