Panchayat Season 4 Review: फुलेरा की गलियों में एक बार फिर लौटे अभिषेक बाबू, लेकिन क्या इस बार भी बसा वही जादू?
8 साल से दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाए हुए वेब सीरीज़ ‘पंचायत’ का चौथा सीजन अब प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रहा है। जितेंद्र कुमार, नीना गुप्ता और रघुबीर यादव जैसे दमदार कलाकारों से सजी यह कहानी एक बार फिर दर्शकों को फुलेरा गांव की उन गलियों में ले जाती है जहां राजनीति, भावनाएं और हल्की-फुल्की जिंदगी के रंग मिलकर एक अनोखा अनुभव गढ़ते हैं। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या सीजन 4 भी पहले जैसे जादू को कायम रख पाया है या कहीं इसकी चमक थोड़ी फीकी पड़ गई है?
कहानी की बुनावट और टकराव
सीजन 4 की कहानी दो मुख्य धारणाओं के इर्द-गिर्द बुनी गई है। एक ओर प्रधानी चुनाव की सियासी सरगर्मी है, जहां मंजू देवी और क्रांति देवी आमने-सामने हैं। वहीं दूसरी ओर अभिषेक त्रिपाठी पर भूषण की ओर से दर्ज कराई गई काउंटर एफआईआर का तनाव भी साथ चलता है। अभिषेक, जो कैट परीक्षा और बिजनेस स्कूल में दाखिले को लेकर पहले से ही तनाव में है, अब उस पर कानूनी शिकंजा कसता दिख रहा है। इन तमाम उलझनों और गांव की रोज़मर्रा की हलचल के बीच सीजन आगे बढ़ता है।
किरदारों की मजबूती बनी रही
‘पंचायत’ की जान हैं इसके किरदार और इस बार भी यह पहलू बिल्कुल कमजोर नहीं पड़ता। जितेंद्र कुमार ने एक बार फिर अभिषेक त्रिपाठी के किरदार को पूरे संयम और ईमानदारी से निभाया है। रघुबीर यादव और नीना गुप्ता, जो अब तक घरेलू नाम बन चुके हैं, अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह फिट नजर आते हैं। विकास, प्रल्हाद, भूषण, बिनोद और क्रांति देवी जैसे सहायक किरदार भी अपनी-अपनी जगह मजबूत पकड़ बनाए रखते हैं। दर्शक इन पात्रों से अब केवल जुड़ते नहीं, बल्कि उन्हें अपने घर का सदस्य समझते हैं।
निर्देशन और लेखन का संतुलन
दीपक कुमार मिश्रा का निर्देशन फिर से साबित करता है कि कम में भी गहराई लाई जा सकती है। गांव की सच्चाई, बातचीत की सहजता और लोगों के बीच के रिश्तों को जिस खूबसूरती से परोसा गया है, वो निर्देशन का मजबूत पक्ष है। चंदन कुमार का लेखन भी संवादों के स्तर पर शानदार है—कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला यहां देखने को मिलती है। हालांकि, इस बार स्क्रिप्ट में कुछ जगहों पर ढील महसूस होती है। कई सबप्लॉट्स जैसे मंजू देवी के पिता की कहानी अनावश्यक और खिंची हुई लगती है।
क्या है सीजन की खासियत
– गांव की मिट्टी से जुड़ी कहानियां जो अब भी सादगी का एहसास कराती हैं।
– किरदारों के बीच की बॉन्डिंग, हल्के-फुल्के ह्यूमर और गंभीर लम्हों का सुंदर संतुलन।
– असली लोकेशन और लोकल भाषा का फ्लेवर अब भी कायम है।
– देसी दर्शकों के लिए यह सीरीज अब भी एक ‘कंफर्ट वॉच’ है—जिसे आप आराम से देख सकते हैं।
कमजोर पड़ते बिंदु
– कहानी में नयापन की कमी साफ महसूस होती है, जैसा पहले के सीजन में देखा गया था।
– कई एपिसोड्स बहुत धीमी रफ्तार से चलते हैं, जिससे धैर्य की परीक्षा होती है।
– कुछ सीन, खासतौर पर सबप्लॉट्स, सिर्फ स्क्रीन टाइम भरने के लिए लगे हैं।
देखें या छोड़ें?
अगर आप ‘पंचायत’ के पहले तीन सीजन के प्रशंसक हैं, तो चौथा सीजन भी आपको निराश नहीं करेगा—हालांकि यह पहले जैसा प्रभाव नहीं छोड़ता। यह सीजन कोई धमाकेदार मोड़ या चौंकाने वाला ट्विस्ट नहीं लाता, लेकिन जीवन की छोटी-छोटी परेशानियों और भावनाओं को खूबसूरती से पेश करता है। अगर आप धीमी गति वाली, दिल से निकली हुई और ज़मीन से जुड़ी कहानियों के शौकीन हैं, तो ‘पंचायत 4’ आपके लिए एक अच्छा अनुभव साबित हो सकती है। बस, बहुत ज्यादा एक्सपेक्टेशन के साथ न जाएं।
रेटिंग: 3.5/5
सादगी, किरदार और संवादों के लिए एक मजबूत सीजन, लेकिन नई ऊंचाइयों तक पहुंचने से थोड़ा चूक गया।
Share this content:
