मुंबई में 122 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले में पुलिस ने फरार आरोपी अरुणाचलम उल्लानाथन मारुथुवर को गिरफ्तार किया, जांच में नया मोड़
मुंबई: न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक (एनआईसीबी) में 122 करोड़ रुपये के घोटाले से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू), मुंबई ने फरार आरोपी अरुणाचलम उल्लानाथन मारुथुवर को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी उस समय हुई जब अरुणाचलम ने रविवार सुबह ईओडब्ल्यू कार्यालय में आत्मसमर्पण किया। वह पिछले एक महीने से फरार था और इस घोटाले में उसकी संलिप्तता महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
आरोप और गिरफ्तारियां
ईओडब्ल्यू के मुताबिक, अरुणाचलम उल्लानाथन मारुथुवर पर आरोप है कि उसने मुख्य आरोपी हितेश मेहता के साथ मिलकर एनआईसीबी के गबन में लगभग 30 करोड़ रुपये प्राप्त किए। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए ईओडब्ल्यू ने देशभर में कई टीमों का गठन किया था ताकि फरार आरोपी का पता लगाया जा सके।
आखिरकार, अरुणाचलम ने आत्मसमर्पण कर दिया, और उसे अदालत में पेश किया गया, जहां 18 मार्च तक पुलिस रिमांड पर भेजने का आदेश दिया गया। इस मामले में गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी है, और अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें अरुणाचलम के बेटे मनोहर अरुणाचलम भी शामिल हैं, जो अपने पिता को भागने में मदद करने और धोखाधड़ी में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार हुआ था।
अन्य गिरफ्तारी
15 मार्च को, ईओडब्ल्यू ने वडोदरा से सिविल कॉन्ट्रैक्टर कपिल देधिया को गिरफ्तार किया, जो न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक में 122 करोड़ रुपये के गबन के मामले में संलिप्त था। कपिल को शनिवार को मुंबई लाया गया और उसे 19 मार्च तक पुलिस रिमांड में भेज दिया गया।
ईओडब्ल्यू ने पहले ही मुख्य आरोपी हितेश मेहता, बैंक के महाप्रबंधक और खातों के प्रमुख, बैंक के पूर्व सीईओ अभिमन्यु भोयान और रियल एस्टेट डेवलपर धर्मेश पौन को गिरफ्तार कर लिया था। इस घोटाले में अब तक पांच लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि कई अन्य आरोपी फरार हैं, जिनमें बैंक के पूर्व अध्यक्ष हिरेन भानु और उनकी पत्नी, और पूर्व उपाध्यक्ष गौरी भानु शामिल हैं, जो घोटाले के सामने आने के बाद विदेश भाग गए थे।
न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक का गबन मामला
न्यू इंडिया को-ऑपरेटिव बैंक (एनआईसीबी) में 122 करोड़ रुपये के गबन का मामला बेहद जटिल और गंभीर है। पुलिस के अनुसार, मुंबई के प्रभादेवी और गोरेगांव कार्यालयों की तिजोरियों से यह राशि गबन की गई थी। यह घोटाला तब सामने आया जब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बैंक की नकदी तिजोरियों का निरीक्षण किया। इसके बाद बैंक के बोर्ड को भंग कर दिया गया और एक प्रशासक नियुक्त किया गया।
आरबीआई द्वारा कार्रवाई के बाद दादर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया, और बाद में यह जांच आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) को सौंप दी गई। अब तक इस मामले में कुल पांच गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, और मामले के अन्य आरोपी फरार हैं।
जांच और भविष्य की कार्रवाई
ईओडब्ल्यू की टीम ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई पहलुओं पर जांच शुरू की है कि गबन की गई राशि किस तरह से वितरित की गई और अन्य आरोपियों की भूमिका क्या थी। अधिकारियों का कहना है कि इस घोटाले से जुड़ी जांच तेज़ी से चल रही है, और सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
जांच के दौरान यह स्पष्ट हो चुका है कि बैंक के अधिकारियों और अन्य संदिग्ध व्यक्तियों ने मिलकर यह घोटाला किया था, जो अब कई लोगों के लिए परेशानी का कारण बन चुका है। ईओडब्ल्यू ने चेतावनी दी है कि इस मामले में किसी भी आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा और भविष्य में ऐसे घोटालों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे।
यह मामला न केवल बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि देश में वित्तीय अपराधों से निपटने के लिए और भी सख्त उपायों की आवश्यकता है। अब यह देखना होगा कि इस मामले में और कौन-कौन से आरोपी सामने आते हैं और बैंकिंग क्षेत्र में कितनी और सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।
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