न्यूरोडाइवर्जेंट स्पेक्ट्रम क्या है, क्यों होते हैं बच्चे इसके शिकार, और कैसे मिल सकती है मदद
आमिर खान की नई फिल्म ‘सितारे ज़मीन पर’ एक बार फिर समाज का ध्यान उन खास बच्चों की ओर खींच रही है जिन्हें मेडिकल टर्म में न्यूरोडाइवर्जेंट कहा जाता है। फिल्म में काम कर रहे 10 बच्चे ऐसे हैं जो अलग-अलग मानसिक स्थितियों से जूझ रहे हैं, और जिनका व्यवहार, सोचने-समझने का तरीका सामान्य बच्चों से अलग है।
न्यूरोडाइवर्जेंट कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक स्पेक्ट्रम है, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर, ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर), डिस्लेक्सिया, डिस्कैल्कुलिया, डिस्प्रैक्सिया और टॉरेट सिंड्रोम जैसी स्थितियां आती हैं। इन सभी का मस्तिष्क अलग तरह से काम करता है, और यही उन्हें न्यूरोटिपिकल बच्चों से अलग बनाता है।
डॉक्टरों के अनुसार, इन स्थितियों का कोई स्थायी इलाज नहीं होता क्योंकि ये जेनेटिक और न्यूरोलॉजिकल कारणों से होती हैं, लेकिन सही थेरेपी, गाइडेंस और व्यवहारिक सहयोग से इन्हें मैनेज किया जा सकता है।
दिल्ली एम्स के पूर्व पीडियाट्रिक विशेषज्ञ डॉ. राकेश बागड़ी के मुताबिक, न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चे किसी भी तरह से मानसिक रूप से कमजोर नहीं होते। बल्कि कई बार वे कला, संगीत, गणना या किसी विशेष क्षेत्र में बेहद असाधारण क्षमता दिखाते हैं। बस उन्हें पढ़ाने और समझाने का तरीका थोड़ा अलग होना चाहिए।
डॉ. बागड़ी कहते हैं कि इन बच्चों को समाज से अलग मानना या उन्हें हीन दृष्टि से देखना गलत है। अगर हम उन्हें सही माहौल, विशेष शिक्षण तकनीक और सहारा दें तो वे न केवल सामान्य जीवन जी सकते हैं बल्कि समाज में प्रेरणा का स्रोत भी बन सकते हैं।
न्यूरोडाइवर्जेंट बच्चों के लिए जरूरी है कि उन्हें परिवार, स्कूल और समाज की तरफ से स्वीकृति और समझदारी मिले। समय पर पहचान और सही दिशा उन्हें सफलता की राह पर ले जा सकती है।
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