‘मेरे हसबैंड की बीवी’: क्या यह कॉमेडी-लव ट्रायंगल सच में आपको हंसी और रोमांस दे पाएगा? जानें फिल्म की पूरी सच्चाई!
अर्जुन कपूर, भूमि पेडनेकर और रकुलप्रीत सिंह की आने वाली फिल्म ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। फिल्म का इंतजार पिछले कुछ महीनों से हो रहा था, और अब विकी कौशल की ‘छावा’ के बाद यह फिल्म दर्शकों के सामने है। दोनों फिल्मों की रिलीज के बाद बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म कैसी प्रदर्शन करती है, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन सवाल ये है कि क्या यह फिल्म वाकई दर्शकों का दिल जीतने में सफल हो पाई है? अगर आप भी यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या आपको थिएटर में जाकर ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ देखनी चाहिए या नहीं, तो हम आपको इसका पूरा रिव्यू दे रहे हैं।
मुदस्सर अज़ीज़ का ‘वन टाइम वॉच’ अनुभव
फिल्म ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ का निर्देशन किया है मुदस्सर अज़ीज़ ने, जो लव ट्रायंगल और रोमांटिक कॉमेडी के जानकार हैं। फिल्म में बेशक आपको पुराने जमाने की फिल्मों की झलक देखने को मिलती है, लेकिन फिल्म को ‘90s की यादें’ ताजा करने वाली कोई शानदार कृति नहीं कहा जा सकता। इसकी कहानी और दिशा थोड़ी सी ढीली और अनुमानित है। मेकर्स की ओर से दावा किया गया था कि वे उस दौर की फिल्मों को फिर से ताजगी देने की कोशिश करेंगे, लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ खास नहीं है जो दर्शकों को कुछ नया और हैरान करने वाला अनुभव दे सके। अगर आप 90s के दौर की फिल्में पसंद करते हैं तो यह फिल्म आपको जरूर पसंद आ सकती है, लेकिन इसे देखकर जो ठंडी अनुभूति होती है, वह किसी ‘क्लासिक’ के मुकाबले कहीं दूर दूर तक नहीं है।
कहानी: एक अजीब-सा लव ट्रायंगल
फिल्म की कहानी अर्जुन कपूर, भूमि पेडनेकर और रकुलप्रीत सिंह के बीच के रोमांटिक उलझाव के इर्द-गिर्द घूमती है। अर्जुन कपूर के किरदार अंकुर चड्ढा की सबसे बड़ी समस्या उसकी पत्नी प्रबलीन कौर (भूमि पेडनेकर) है। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब अंकुर की जिंदगी में अंतरा खन्ना (रकुलप्रीत) आ जाती है, और वह उससे प्यार करने लगता है। इसी बीच एक एक्सीडेंट में प्रबलीन अपनी याददाश्त खो बैठती है और भूल जाती है कि वह अंकुर से अलग हो चुकी है। अब कहानी का असली सवाल यह बन जाता है कि अंकुर इन दोनों में से किसे चुनने वाला है। इस दिलचस्प लव ट्रायंगल के इस उलझाव को हल करने के लिए आपको फिल्म थिएटर में देखनी होगी।
कैसी है फिल्म: कॉमेडी और एंटरटेनमेंट के बीच झूलती हुई
फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसकी कॉमेडी है। शुरुआत से लेकर अंत तक फिल्म दर्शकों को हंसी के जरिए बोर नहीं होने देती। यह फिल्म मनोरंजन से भरपूर है और आपको हल्के-फुल्के अंदाज में रोमांस भी दिखाती है। हालांकि, कुछ सीन में ऐसी अनलॉजिकल बातें हैं, जो शायद फिल्म की कहानी को मजबूती से नहीं जोड़ पातीं। एक्टर्स ने अपने-अपने रोल को संभालने की पूरी कोशिश की है, लेकिन कुल मिलाकर यह फिल्म उस टॉफी की तरह महसूस होती है, जो स्वाद में मीठी तो लगती है, लेकिन कुछ खास मजा नहीं देती।
निर्देशन: ‘औसत’ से ज्यादा की उम्मीद थी
मुदस्सर अजीज़ ने इस फिल्म के निर्देशन में अपनी अनुभव और लव ट्रायंगल पर महारथ साबित की है, लेकिन इस बार वह कुछ खास नहीं कर पाए। ‘पति पत्नी और वो’ जैसी फिल्म के निर्देशक मुदस्सर से उम्मीद की जा रही थी कि वह इस फिल्म में कुछ बेहतर प्रस्तुत करेंगे, लेकिन फिल्म का निर्देशन ‘औसत’ से ऊपर नहीं जा सका। इस बार भी कहानी में कुछ खास नहीं है, और पूरी फिल्म को एक सामान्य स्क्रीनप्ले के साथ प्रस्तुत किया गया है।
जहां पहले मुदस्सर ने कुछ रोमांटिक और इंटरेस्टिंग ट्विस्ट डाले थे, वही इस बार फिल्म की कहानी थोडी़ ज्यादा प्रेडिक्टेबल हो गई है। फिल्म का स्क्रीनप्ले ठीक है, लेकिन आजकल दर्शक इस तरह की फिल्मों को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ज्यादा पसंद करते हैं। इसलिए अगर आपको हल्का-फुल्का रोमांस और कॉमेडी पसंद है तो फिल्म को एक बार जरूर देख सकते हैं, लेकिन अगर आप कुछ और ताजगी की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह आपको थोड़ा निराश कर सकती है।
क्या फिल्म को सिनेमाघरों में देखना चाहिए?
अगर आप केवल एक हल्की-फुल्की और मनोरंजन से भरपूर फिल्म देखना चाहते हैं, तो ‘मेरे हसबैंड की बीवी’ एक ‘वन टाइम वॉच’ हो सकती है। फिल्म के कास्ट और कॉमेडी आपको अच्छा अनुभव दे सकते हैं, लेकिन कुछ हद तक यह प्रेडिक्टेबल है और पुराने जमाने की फिल्मों की महक भी नहीं छोड़ पाई है।
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