April 17, 2026

मध्य प्रदेश में सरपंच पर गंभीर आरोप: ठेकेदार को सौंपा पंचायत का काम, जांच में खुलासा

मध्य प्रदेश के नीमच जिले के ग्राम पंचायत दांता से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां की सरपंच कैलाशी बाई कच्छावा को पद से हटा दिया गया है। यह मामला उस समय सुर्खियों में आया, जब सरपंच ने कथित तौर पर 500 रुपये के स्टाम्प पर एक ठेकेदार सुरेश गरासिया के साथ पंचायत के सभी कार्य सौंपने का अनुबंध किया। जांच में यह खुलासा हुआ है कि सरपंच ने अपने अधिकार ठेकेदार को सौंप दिए थे, जो पंचायती राज व्यवस्था के खिलाफ थे। इसके बाद जिला पंचायत ने उन्हें सरपंच पद से हटा दिया।

अनुबंध की फोटोकॉपी का खुलासा

कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुए अनुबंध पत्र की फोटोकॉपी में यह उल्लेख था कि कैलाशी बाई पंचायत का काम करने में असमर्थ हैं और इसलिए उन्होंने सुरेश गरासिया को अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया है। अनुबंध में यह भी लिखा था कि मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना, वाटरशेड सहित सभी सरकारी योजनाओं के कार्य अब सुरेश ही देखेंगे। इसके अलावा, सरपंच ने यह भी लिखा कि जब तक वह पद पर रहेंगी, तब तक सुरेश ही सभी कार्य करेंगे और किसी भी स्थिति में वह हस्तक्षेप नहीं करेंगी। यह अनुबंध वायरल होने के बाद से ही मामला तेजी से बढ़ा और चर्चा का विषय बन गया।

जिला पंचायत ने जारी किया कारण बताओ नोटिस

6 फरवरी को जिला पंचायत ने इस अनुबंध के मामले में कैलाशी बाई को कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके जवाब में 8 फरवरी को कैलाशी बाई ने लिखित में कहा कि उन्होंने ऐसा कोई अनुबंध नहीं किया और जो अनुबंध वायरल हो रहा है, वह पूरी तरह से फर्जी है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके हस्ताक्षर भी नकली हैं। इसी बीच, ग्राम पंचायत सचिव जीवन लाल पाटीदार को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। पाटीदार ने 8 फरवरी को जवाब दिया कि उन्हें इस अनुबंध की कोई जानकारी नहीं है और पंचायत के सभी कार्य कैलाशी बाई ही देख रही थीं।

जांच में हुआ बड़ा खुलासा

इस मामले की गहन जांच के दौरान उप पंजीयक रामपुरा से अनुबंध के रजिस्ट्रेशन की जानकारी मांगी गई। 10 फरवरी को उप पंजीयक ने पुष्टि की कि यह अनुबंध उनके कार्यालय में पंजीकृत नहीं हुआ था। इसके बाद, अनुबंध में गवाह बने सदाराम और मन्नालाल को बयान देने के लिए बुलाया गया, और दोनों ने यह कहा कि उन्हें अनुबंध के बारे में कोई जानकारी नहीं है और अनुबंध पर उनके हस्ताक्षर भी फर्जी हैं।

जांच में स्टाम्प वेंडर से भी जानकारी ली गई, जिसमें यह पुष्टि हुई कि अनुबंध पर इस्तेमाल किया गया स्टाम्प कैलाशी बाई ने ही खरीदा था, जैसा कि स्टाम्प खरीदने की रसीद में उनका नाम दर्ज था।

सरपंच पद से हटाए जाने की कार्रवाई

पूरी जांच के बाद यह सामने आया कि कैलाशी बाई ने अपने अधिकार ठेकेदार को सौंप दिए, जो पंचायती राज व्यवस्था के खिलाफ थे। इसे जनहित के विरुद्ध मानते हुए, मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 40 के तहत कैलाशी बाई को सरपंच पद से हटा दिया गया।

अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह मामला और बढ़ेगा या फिर यह सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित रहेगा। जांच पूरी होने के बाद यह देखा जाएगा कि इस मामले में आगे क्या कार्रवाई की जाती है। इस विवाद ने पंचायती राज व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

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