लखनऊ डिफेंस कॉरिडोर घोटाला: सरकारी जमीन कैसे बनी प्राइवेट संपत्ति, करोड़ों का खेल उजागर
लखनऊ। राजधानी के सरोजनीनगर तहसील क्षेत्र के भटगांव में डिफेंस कॉरिडोर परियोजना के लिए अधिग्रहित की जा रही जमीनों में बड़ा घोटाला सामने आया है। सरकारी अधिकारियों और भू-माफियाओं की मिलीभगत से करोड़ों रुपये के मुआवजे की लूट की साजिश को अंजाम दिया गया। वर्ष 2021 में सरकारी दस्तावेजों की अनदेखी करते हुए कृषि योग्य बंजर और सार्वजनिक उपयोग की श्रेणी-5 (3 क) की भूमि को निजी लोगों के नाम दर्ज करा दिया गया।
सरकारी नियमों के मुताबिक, ऐसी जमीन को किसी भी स्थिति में निजी व्यक्तियों को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता, लेकिन इस घोटाले में सरकारी रिकॉर्ड तक से छेड़छाड़ की गई। जानकारों का कहना है कि यदि इस पूरे प्रकरण की गहराई से जांच की जाए, तो एक बड़ा भू-माफिया गिरोह और उसमें शामिल अधिकारियों का खुलासा हो सकता है।
कैसे हुआ करोड़ों का खेल?
जांच में सामने आया है कि एक ही खरीदार ने कई फर्जी आवंटियों से जमीन अपने नाम करा ली और बाद में इसे डिफेंस कॉरिडोर के लिए कार्यरत संस्था यूपी एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (यूपीडा) को ऊंची कीमत पर बेच दिया। इस दौरान जिला प्रशासन, तहसील प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की मिलीभगत स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
मामले की पड़ताल में यह भी सामने आया कि डिफेंस कॉरिडोर की सीमा के भीतर नौ और बाहर 31 गाटा संख्या की जमीनें ऐसी थीं, जो कृषि योग्य बंजर और वन भूमि के रूप में दर्ज थीं। बावजूद इसके, इन जमीनों को फर्जीवाड़े से निजी नामों में बदलकर करोड़ों रुपये का मुआवजा हड़प लिया गया।
फर्जी दस्तावेजों के सहारे हुआ खेल
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस विक्रेता ने यूपीडा को जमीन बेची, बिक्री की तारीख को उसका नाम खतौनी में दर्ज तक नहीं था।
उदाहरण के तौर पर, 14 जून 2021 को विजय कुमार को संक्रमणीय भूमिधर घोषित किया गया। कुछ ही दिनों बाद उन्होंने इस जमीन को मात्र 5.20 लाख रुपये में राजू नामक व्यक्ति को बेच दिया। राजू ने इस जमीन को 14.50 लाख रुपये में वरुण कुमार मिश्रा और उनकी पत्नी सरिता सिंह को हस्तांतरित कर दिया। महज एक महीने बाद, 13 जुलाई 2021 को वरुण और सरिता ने यही जमीन यूपीडा को 57.60 लाख रुपये में बेच दी।
इसी तरह एक अन्य कथित पट्टेदार राम आसरे की जमीन भी पहले अनुबंधित की गई और बाद में निरस्त कर दी गई। इसके बाद एक अन्य खरीदार, बंका ने इसे खरीदा और वही जमीन यूपीडा को फिर से 57.60 लाख रुपये में बेच दी।
1985 की ‘फर्जी’ पट्टा पत्रावली बनी आधार
इस पूरे घोटाले की नींव 1985 में तैयार एक संदिग्ध पट्टा पत्रावली से रखी गई थी। रिकॉर्ड के अनुसार, 22 जून 1984 को तत्कालीन ग्राम प्रधान बाबू लाल और इंचार्ज लेखपाल भगवानदीन ने 128 पात्र लाभार्थियों की सूची तैयार की थी। इसमें से केवल 15 भूमिहीन अनुसूचित जाति के खेतिहर मजदूरों का आवंटन तत्कालीन परगनाधिकारी (सहायक कलेक्टर) ने स्वीकार किया था।
लेकिन 28 जनवरी 1985 को एक नई सूची तैयार की गई, जिसमें पहली सूची के अधिकांश नाम दोबारा प्रस्तुत किए गए। इस पत्रावली में न तो तत्कालीन तहसीलदार की संस्तुति थी और न ही एसडीएम की। जहां एसडीएम के हस्ताक्षर मौजूद थे, वे भी अन्य दस्तावेजों पर दर्ज उनके हस्ताक्षर से मेल नहीं खाते। इससे स्पष्ट है कि 1985 की यह पत्रावली पूरी तरह फर्जी थी।
इसी फर्जी पत्रावली को आधार बनाकर वर्ष 2021 में तहसील प्रशासन और राजस्व विभाग के अधिकारियों ने भूमिधरी अधिकार देने का खेल खेला और करोड़ों रुपये का मुआवजा हड़पने की साजिश को अंजाम दिया।
कौन हैं असली गुनहगार?
इस घोटाले में जिला और तहसील प्रशासन के कई अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। जानकारों का कहना है कि यदि जमीन खरीदने वालों की भी गहराई से जांच की जाए, तो पूरे षड्यंत्र का पर्दाफाश हो सकता है।
सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर, भूमिहीनों को दी जाने वाली भूमि का फर्जी हस्तांतरण और मुआवजा राशि में हेराफेरी – ये सभी तथ्य प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अब देखना यह है कि इस बड़े घोटाले की परतें कब और कैसे खुलती हैं और असली दोषियों पर कब तक कार्रवाई होगी।
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