लखनऊ: मुसलमानों को फिर साथ लाने की कोशिश में मायावती, ‘भाईचारा’ से बदल रही सियासी रणनीति

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती एक बार फिर मुस्लिम वोट बैंक को साधने में जुटी हैं। 2022 और 2024 के चुनावों में मिली हार के बाद मुसलमानों पर नाराज़ दिखी मायावती अब अपने रुख में नरमी लाती नज़र आ रही हैं। उन्होंने पार्टी के मुस्लिम समाज भाईचारा संगठन को दोबारा सक्रिय करने की योजना बनाई है। बुधवार को उन्होंने प्रदेशभर के संगठन पदाधिकारियों के साथ बैठक की, जिसमें मुस्लिम समुदाय तक पार्टी की पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा हुई।

हाल ही में बीजेपी नेता राघवेंद्र प्रताप सिंह के विवादित बयान पर मायावती ने सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे लोगों के खिलाफ सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बयान और मुस्लिम समाज के प्रति उनका नया रवैया, दोनों ही संकेत हैं कि बसपा आगामी चुनावों से पहले “दलित-मुस्लिम एकता” के पुराने फार्मूले को फिर से आजमाना चाहती है।

2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में हार के बाद मायावती ने मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने कहा था कि टिकटों में बड़ा प्रतिनिधित्व मिलने के बावजूद समुदाय ने बसपा को वोट नहीं दिया। 2024 में बसपा ने 35 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उनमें से 34 अपनी ज़मानत भी नहीं बचा पाए। पार्टी का वोट शेयर घटकर 9.39% रह गया, जो 1991 के बाद से सबसे कम था।

उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत यानी लगभग 3.84 करोड़ मुस्लिम आबादी है, जिनका असर पश्चिमी और पूर्वी यूपी के कई जिलों में निर्णायक माना जाता है। 2007 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई बसपा का ग्राफ लगातार गिरता गया है—2012, 2017 और 2022 के तीनों विधानसभा चुनावों में पार्टी को हार मिली। अब मायावती दलित और मुस्लिम वोटरों को एक मंच पर लाकर 2027 के चुनाव में दोबारा वापसी का प्रयास कर रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, मायावती का यह ‘भाईचारा अभियान’ सीधे समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति है। कांशीराम की पुण्यतिथि पर हुई बसपा की हालिया रैली में दलित समुदाय की बड़ी भागीदारी देखकर मायावती को भरोसा है कि अगर मुसलमान भी फिर साथ आ जाएं तो उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बड़ा बदलाव संभव है।

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