लेबनान में नहीं गलेगी अमेरिका की दाल? हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई करने से सेना का इनकार
लेबनान में हिजबुल्लाह को हथियार डालने पर मजबूर करने की अमेरिकी कोशिशें लगातार विफल हो रही हैं। पिछले दो हफ्तों में हुई कूटनीतिक हलचलें बताती हैं कि वाशिंगटन का दबाव उल्टा असर डाल रहा है। अमेरिकी दबाव के चलते न केवल हिजबुल्लाह और उसके सहयोगी और मज़बूत हुए हैं, बल्कि लेबनानी सरकार खुद भी असमंजस की स्थिति में फँस गई है। सेना ने साफ कर दिया है कि वह प्रतिरोध के खिलाफ कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगी जिससे देश की शांति भंग हो।
17 अगस्त को अमेरिकी प्रतिनिधि थॉमस बैरक और मॉर्गन ऑर्टेगस बेयरूत पहुँचे। उन्होंने राष्ट्रपति जोसेफ औन, प्रधानमंत्री नवाफ सलाम और संसद अध्यक्ष नबीह बेरी से मुलाकात की। सबसे अहम मुलाकात सेना प्रमुख जनरल रोडोल्फ हेकल से हुई, जिसमें अमेरिका ने सीधे पूछा कि क्या सेना हिजबुल्लाह को निशस्त्र करने में सहयोग करेगी। लेकिन जनरल हेकल ने दो टूक कहा कि सेना देश के भीतर किसी भी तरह का टकराव नहीं चाहती और वह ऐसा कदम नहीं उठाएगी जो लेबनान की आंतरिक स्थिरता को खतरे में डाल दे।
सरकार की दुविधा भी साफ दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री सलाम की सरकार ने हाल ही में एक रोडमैप पास किया था, जिसके तहत अगले साल तक हिजबुल्लाह को हथियार डालने पर मजबूर करने की योजना बनाई गई थी। लेकिन अब यह योजना ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है। सरकार को उम्मीद थी कि शिया समुदाय इस दिशा में सहमत हो जाएगा, लेकिन उल्टा उन्होंने साफ ऐलान कर दिया है कि वे अपने हथियारों की हर हाल में रक्षा करेंगे। शिया नेताओं ने यहां तक कहा है कि जरूरत पड़ी तो वे कर्बला जैसी जंग लड़ने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
धार्मिक नेताओं की भूमिका भी इस मसले में अहम हो गई है। जाफरी मुफ्ती अहमद कबालान ने राष्ट्रपति औन को कड़ा संदेश भेजा है। उन्होंने चेताया कि हिजबुल्लाह को कमजोर करने की बयानबाजी और युद्धोन्मादी रुख लेबनान को और गहरे संकट में धकेल सकता है। मुफ्ती ने साफ कहा कि हिजबुल्लाह के हथियार सेना के साथ मिलकर देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। इस बीच, इजराइल ने भी दक्षिणी लेबनान में अपनी चौकियों को और मजबूत करना शुरू कर दिया है। इजराइली सेना प्रमुख एयाल जामिर ने कब्जाए गए इलाकों से पीछे हटने से इनकार कर दिया है, जिससे लेबनानी सरकार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
अमेरिकी योजना के असफल होने की एक बड़ी वजह भरोसे की कमी भी है। लेबनानी नेताओं का कहना है कि अमेरिका की बातों पर विश्वास करना मुश्किल है, क्योंकि बीते समय में उसके आश्वासनों के बावजूद हिंसक घटनाएं होती रही हैं। उदाहरण के तौर पर, पिछले साल अमेरिका शांति वार्ता की बात कर रहा था, और उसी दौरान हिजबुल्लाह के वरिष्ठ कमांडर फौआद शुकर की हत्या कर दी गई। हाल ही में भी हिजबुल्लाह प्रमुख सैय्यद हसन नसरल्लाह की हत्या हुई, जबकि अमेरिका दावा कर रहा था कि वह तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि लेबनान में अमेरिकी दबाव का असर कम होने के बजाय और उल्टा पड़ रहा है।
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