कारगिल युद्ध की 85 दिन की जंग: जब पाकिस्तान की घुसपैठ को कुचलकर भारत ने रचा विजय का इतिहास
तीखी हवाएं, बर्फ से ढकी चोटियां, और 18 हजार फीट की ऊंचाई पर दुश्मन की घुसपैठ… 1999 की गर्मियों में कुछ ऐसा ही था कारगिल का वो मैदान, जहां भारतीय सेना और पाकिस्तान के बीच लड़ी गई एक ऐतिहासिक जंग ने पूरे देश की सांसें थाम दी थीं। पहली बार किसी युद्ध में दुश्मन ने इतनी चुपचाप घुसपैठ की थी कि उसकी मौजूदगी का पता भी सबसे पहले एक चरवाहे ने दिया। ये कहानी सिर्फ गोलियों और गोले-बारूद की नहीं है, ये कहानी है 85 दिनों की असंभव दिखने वाली जीत की, जब भारत ने हर चोट पर तिरंगा फहराकर दुनिया को दिखा दिया कि उसकी सरहदें अजेय हैं।
कारगिल युद्ध की शुरुआत 3 मई 1999 से मानी जाती है, लेकिन साजिश उससे बहुत पहले रची जा चुकी थी। पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन बद्र’ नाम के गुप्त अभियान के तहत अपने सैनिकों और प्रशिक्षित आतंकवादियों को कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा करने के लिए भेजा था। इस घुसपैठ का मकसद था – श्रीनगर-लेह हाइवे को काटना, जिससे लद्दाख क्षेत्र से भारत का संपर्क टूट जाए। लेकिन जब स्थानीय चरवाहों ने इलाके में संदिग्ध गतिविधियां देखीं और सेना को सूचना दी, तो पूरी साजिश की परतें खुलने लगीं। भारतीय सेना ने जवाब में ‘ऑपरेशन विजय’ की शुरुआत की और यहीं से शुरू हुआ देश के इतिहास का एक सबसे कठिन लेकिन गौरवपूर्ण सैन्य अभियान।
भारतीय जवानों को बेहद कठिन हालात में लड़ाई लड़नी पड़ी। दुश्मन ऊंचाई पर था, जबकि भारतीय सैनिक नीचे से चढ़ाई करते हुए मुकाबला कर रहे थे। हर कदम पर बर्फ, पत्थर, बारूदी सुरंगें और गोलियों की बौछार थी, लेकिन हौसलों की ऊंचाई किसी चोटी से कम नहीं थी। 26 मई से भारतीय वायुसेना ने भी अभियान में हिस्सा लिया और दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए। धीरे-धीरे बटालिक, काकसर, टोलोलिंग, द्रास और टाइगर हिल जैसी रणनीतिक चोटियां एक-एक कर भारतीय सेना के कब्जे में आती गईं।
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी भारत को इस युद्ध में कूटनीतिक जीत मिली। अमेरिका, फ्रांस और अन्य देशों ने पाकिस्तान की कार्रवाई की निंदा की और उसे नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करने वाला बताया। 4 जुलाई को जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अमेरिका में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मुलाकात की, तो उन्हें साफ तौर पर कहा गया कि पाकिस्तान अपनी सेना को वापस बुलाए। वैश्विक दबाव और भारतीय सेना की दृढ़ता के सामने आखिरकार पाकिस्तान को घुटने टेकने पड़े और 12 जुलाई को उसने पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
26 जुलाई 1999… भारतीय सेना ने दुश्मन को पूरी तरह खदेड़ दिया और कारगिल की हर ऊंचाई पर तिरंगा फिर से लहराया। इस युद्ध में भारत के 527 वीर सैनिक शहीद हुए, और 1600 से अधिक घायल हुए। कैप्टन विक्रम बत्रा, लेफ्टिनेंट मनोज पांडे, हवलदार संजय कुमार जैसे रणबांकुरों ने अपने साहस और बलिदान से इतिहास रच दिया। टाइगर हिल की 11 घंटे लंबी लड़ाई, टोलोलिंग की चढ़ाई और हर पोस्ट पर डटे रहना – इन सभी ने इस युद्ध को एक उदाहरण बना दिया कि सच्चे राष्ट्रभक्त कभी हार नहीं मानते।
कारगिल विजय दिवस सिर्फ एक सैन्य जीत की तारीख नहीं है, बल्कि ये हर भारतीय के दिल में बसे उस गर्व की याद है जो देश की रक्षा के लिए दिए गए बलिदानों से जुड़ा है। आज 26 साल बाद भी जब 26 जुलाई आती है, तो देश भर में कारगिल के वीरों को श्रद्धांजलि दी जाती है। यह दिन आने वाली पीढ़ियों को बताता है कि जब सरहद पर संकट आया, तो देश के जवान चट्टान बनकर खड़े हुए और भारत को जीत दिलाई।
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