रहस्य, त्याग और भक्ति से भरी है रथ यात्रा की ये कथा: आखिर कैसे बनीं रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ की ‘मौसी’?
पुरी की रथ यात्रा सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि त्याग, श्रद्धा और तपस्या की ऐसी जीवंत कहानी है, जो हर साल आषाढ़ मास की द्वितीया तिथि को दोहराई जाती है। तीनों भाई-बहन—भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा—जब सिंहद्वार से निकलते हैं और लगभग तीन किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं, तो यह यात्रा मात्र एक शोभायात्रा नहीं होती, बल्कि एक अद्भुत मिलन की स्मृति होती है—भगवान की अपनी “मौसी” से पुनर्मिलन की। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर यह रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ की मौसी कैसे बनीं? इसका उत्तर इतिहास, तपस्या और दिव्यता से जुड़ा है…
जब खड़ा हुआ प्राण-प्रतिष्ठा का सवाल…
उत्कल नरेश राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडिचा ने जब भगवान नीलमाधव के लिए एक भव्य मंदिर बनवाया, तब एक सवाल सामने आया कि प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा कौन करेगा? यह कार्य इतना आसान नहीं था। तब नारद जी से आग्रह किया गया, लेकिन उन्होंने कहा—यह कार्य स्वयं ब्रह्माजी को करना चाहिए। नारद जी राजा को ब्रह्मलोक ले जाने को तैयार हुए, लेकिन चेताया कि लौटने में धरती पर सैकड़ों वर्ष बीत सकते हैं। राजा ने संकल्प लिया कि चाहे कुछ भी हो, वे यह कार्य करेंगे।
रानी गुंडिचा का तप और साधना
राजा के ब्रह्मलोक जाने के बाद रानी गुंडिचा ने कठोर तपस्या और समाधि का व्रत लिया। उन्होंने कहा कि जब तक राजा नहीं लौटते, वह समाधि में रहेंगी। राजकाज की जिम्मेदारी विद्यापति और उनकी पत्नी ललिता ने ली और उन्होंने वंश परंपरा को भी आगे बढ़ाया, लेकिन रानी का तप अडिग रहा।
सदियों बाद राजा की वापसी और बदला हुआ युग
जब राजा ब्रह्मलोक से लौटे, तब धरती पर बहुत कुछ बदल चुका था। पुरी अब राजा गालु माधव के अधीन था। पुराने मंदिर पर रेत जम चुकी थी और समय की रेखाएं सब मिटा चुकी थीं। एक समुद्री तूफान ने मंदिर की रेत को हटा दिया, जिससे पुराना मंदिर फिर से प्रकट हुआ।
हनुमान जी ने किया न्याय
गालु माधव और राजा इंद्रद्युम्न के बीच विवाद छिड़ा कि असली मंदिर किसका है। तभी संत रूप में हनुमान जी प्रकट हुए और सत्य की परख के लिए राजा इंद्रद्युम्न को गर्भगृह का रास्ता बताने को कहा। राजा ने वह मार्ग दिखा दिया जो किसी को ज्ञात नहीं था, और इस तरह सत्य की पुष्टि हुई।
रानी का पुनर्जागरण और ‘मौसी’ की उपाधि
समाधि में लीन रानी गुंडिचा को पति की वापसी का आभास हुआ और वे बाहर आईं। वर्षों बाद उनका पुनर्मिलन राजा से हुआ। तब एक युवा दंपति ने उन्हें ‘माई’ कहकर वंदन किया और बताया कि वे विद्यापति-ललिता के वंशज हैं और उन्हें देवी मानकर पूजते आए हैं।
जब मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा स्वयं ब्रह्मा जी के द्वारा राजा और रानी के हाथों करवाई गई, तब भगवान प्रकट हुए और राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा ने श्रमिकों, सेवकों और पुजारियों के लिए सेवा-संलग्नता का वर मांगा। फिर रानी के त्याग की बात करते हुए उनसे भी कोई वरदान मांगा।
तब भगवान ने कहा – तुम मेरी मां जैसी हो
भगवान जगन्नाथ ने रानी गुंडिचा से कहा—”आपने मेरी मां की तरह प्रतीक्षा की, तप किया। इसलिए आज से आप मेरी मौसी हैं। मैं हर साल आपसे मिलने आऊंगा। जहां आपने तप किया, वह स्थान ‘गुंडिचा धाम’ कहलाएगा और देवी पीठ के रूप में पूजित होगा।”
‘छेरा पहरा’ की शुरुआत और परंपराएं जो आज भी जीवित हैं
भगवान ने यह भी कहा कि हर पुरी नरेश को ‘छेरा पहरा’—रथ यात्रा के मार्ग को सोने के झाड़ू से बुहारने का सौभाग्य प्राप्त होगा। यही परंपरा आज भी जीवित है।
आज भी पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दौरान गुंडिचा मंदिर तक जाने की यह यात्रा उस पवित्र रिश्ते की गवाह बनती है, जो भक्त और भगवान के बीच के प्रेम, त्याग और तपस्या से उपजा है। गुंडिचा धाम न सिर्फ एक मंदिर है, बल्कि एक गाथा है उस नारी की, जिसने मातृत्व सुख त्यागकर संपूर्ण जीवन एक प्रतीक्षा में समर्पित कर दिया—और इसीलिए वह कहलाईं भगवान की मौसी।
Share this content:
